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फैसला : दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा-28 हफ्ते का भ्रूण अस्वस्थ तो अंतिम निर्णय मां का

Sun, 02 Jan 2022 05:00 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 02 Jan 2022 05:00 AM IST
सार

हाईकोर्ट ने कहा कि ‘हमें प्रजनन के चुनाव को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आयाम में देखना चाहिए। यह संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए मूल अधिकार के तहत आता है।

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Delhi High Court said if the 28-week fetus is unwell then the final decision is of the mother
अदालत ने आरोपियों पर 22-22 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। - फोटो : Social Media

विस्तार

अदालत ने कहा कि प्रजनन को व्यक्तिगत स्वतंत्रता की नजर से देखें। भ्रूण में शारीरिक समस्याएं बताते हुए बोर्ड ने कहा था पैदा होने वाला नवजात सामान्य जीवन नहीं जी सकेगा। मां के गर्भ में पल रहा 28 हफ्ते का भ्रूण अस्वस्थ हो और जीवन में स्वास्थ्य संबंधित जटिलताएं बनीं रहने की आशंका चिकित्सक जताएं तो क्या उसे शिशु के रूप में जन्म देना उचित होगा?

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ऐसे ही एक मामले में यह निर्णय दिल्ली हाईकोर्ट ने खुद मां पर छोड़ा। हाईकोर्ट ने कहा कि ‘हमें प्रजनन के चुनाव को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आयाम में देखना चाहिए। यह संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए मूल अधिकार के तहत आता है।’
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महिला ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी अधिनियम के तहत अनुमति के लिए हाईकोर्ट में याचिका की थी। उसने बताया था कि भ्रूण में कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं, जो हमेशा बनी रहेंगी। यह भी कहा था कि गर्भावस्था को जारी रखना उसके शारीरिक व मानसिक सेहत को खतरे में डालने जैसा होगा। भारत में कुछ अपवाद छोड़कर 24 हफ्ते से अधिक उम्र का भ्रूण टर्मिनेट करना गैरकानूनी है। मामले में सुनवाई के बाद जस्टिस ज्योति सिंह ने महिला को निर्णय करने की स्वतंत्रता दे दी।
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निर्णय में कहा : यह उसी का चुनाव है
हाईकोर्ट ने कहा कि इन हालात में याची गर्भावस्था को जारी नहीं रखना चाहती, जो उचित लगता है। अंतिम निर्णय उसे लेना चाहिए। वह मर्जी के चिकित्सा संस्थान में भ्रूण टर्मिनेट करवा सकती है। यह भी साफ किया कि इससे जुड़े जोखिम और परिणाम की भी वही जिम्मेदार होगी।


यह समस्याएं थीं भ्रूण में
एम्स के चिकित्सा बोर्ड ने बताया कि भ्रूण में टेट्रोलॉजी ऑफ फैलो यानी हृदय में ऐसी खामी है, जिससे शरीर में ऑक्सीजन सप्लाई में दिक्कत होगी। वह अब्सेंट पल्मोनरी वाल्व सिंड्रोम व दिल में छेद से भी पीड़ित है। हृदय के दायें हिस्से से रक्त को फेफड़े तक ले जाने वाली धमनियों को गार्ड करने वाले वाल्व का विकास भी नहीं हुआ है। इस कारण जन्म के बाद जल्द ही दिल का ऑपरेशन करना होगा। किशोरावस्था में   फिर ऑपरेशन कराना होगा। इससे वह पूरा जीवन कमजोर सेहत से जूझेगा।

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