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जींस पहनने वाली लड़की लड़कों को भ्रष्ट करती है?: HC ने ऐसी सोच को बताया अस्वीकार्य, कहा- पहनावा व्यक्तिगत पसंद

Mon, 10 Aug 2026 09:17 PM IST
Rahul Kumar Tiwari अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: Rahul Kumar Tiwari Updated Mon, 10 Aug 2026 09:17 PM IST
सार

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि महिला या लड़की का पहनावा उसकी व्यक्तिगत पसंद है और जिरह में कपड़ों को उसके चरित्र या अपराध से जोड़ना गलत है। अदालत ने 17 वर्षीय लड़की से छेड़छाड़ के मामले में आरोपी को दोषी ठहराते हुए पीड़िता की गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा पर जोर दिया।
 

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Delhi High Court observed woman attire is her personal right and not grounds for character assassination
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : AI

विस्तार

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ कहा कि किसी महिला या लड़की का पहनावा उसकी व्यक्तिगत पसंद है। अदालत में जिरह के दौरान कपड़ों को उसके चरित्र पर सवाल उठाने या अपराध का दोष उसी पर डालने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

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न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा की एकल पीठ ने ट्रायल कोर्ट के 2014 के बरी करने के फैसले को रद्द करते हुए आरोपी को आईपीसी की धारा 354ए(1)(i) के तहत दोषी ठहराया। मामला जुलाई 2013 का है, जिसमें एक पड़ोसी पर 17 वर्षीय लड़की का पीछा करने, यौन रंग की टिप्पणियां करने और उसके गाल व निजी अंग को छूने का आरोप था।

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‘जींस पहनने वाली लड़की लड़कों को भ्रष्ट करती है’ वाली सोच अस्वीकार्य
अदालत ने कहा, “किसी लड़की या महिला को क्या पहनना है, यह पूरी तरह उसकी व्यक्तिगत पसंद का मामला है। न पड़ोसियों को, न समाज को, न आरोपी को और न ही अदालत में पेश होने वाले वकील को यह तय करने का अधिकार है कि महिला को क्या पहनना चाहिए। यह किसी के सरोकार का विषय ही नहीं है। कोर्ट ने विशेष रूप से उस सोच पर सख्त टिप्पणी की, जिसमें कहा गया कि जींस पहनने वाली महिला युवा लड़कों को ‘भ्रष्ट’ कर सकती है। न्यायमूर्ति ने कहा कि इसका समाधान लड़कियों और महिलाओं के कपड़ों को नियंत्रित करने में नहीं है। माता-पिता और समाज को बच्चों को अपने व्यवहार पर नियंत्रण रखना, व्यक्तिगत सीमाओं का सम्मान करना और हर व्यक्ति के साथ गरिमा से पेश आना सिखाना चाहिए।
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जिरह में पूछे गए सवाल पूरी तरह अप्रासंगिक
ट्रायल कोर्ट में बचाव पक्ष के वकील ने पीड़िता से उसके पश्चिमी कपड़ों, इलाके के लोगों की आपत्ति और डॉक्टर के पास जाते समय क्या पहना था, जैसे सवाल पूछे थे। अदालत ने कहा कि ये सवाल पीड़िता को शर्मिंदा करने, अपमानित करने और नैतिक रूप से जज करने के मकसद से पूछे गए लगते हैं। ट्रायल जज को शुरुआत में ही ऐसे सवालों को रोक देना चाहिए था।
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धर्म और परंपरा का हवाला भी खारिज
कोर्ट ने मामले में धर्म को शामिल करने की कोशिश पर भी सख्त टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि आईपीसी, पॉक्सो एक्ट और अन्य कानून हर व्यक्ति पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे वह किसी भी धर्म का हो। न धर्म और न स्थानीय परंपरा का इस्तेमाल किसी गैरकानूनी कृत्य को सही ठहराने या महिला की व्यक्तिगत पसंद पर पाबंदी लगाने के लिए किया जा सकता है।

न्यायालयों को भी सतर्क रहने का निर्देश
न्यायमूर्ति सुधा ने कहा कि जब जिरह प्रासंगिकता की सीमा पार कर गवाह को डराने, अपमानित करने या शर्मिंदा करने का माध्यम बन जाती है, तो अदालत को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। अदालती कार्यवाही किसी पीड़ित के लिए दूसरे आघात का कारण नहीं बननी चाहिए। आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार की रक्षा जरूरी है, लेकिन इसका इस्तेमाल गवाह की गरिमा छीनने के लिए नहीं किया जा सकता।
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