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दिल्ली: हाईकोर्ट का एम्स को अवैध रूप से हटाए गए कर्मी को 50 लाख रुपये देने का निर्देश

पीटीआई, नई दिल्ली Published by: अनुराग सक्सेना Updated Sun, 24 Oct 2021 04:47 PM IST

सार

दिल्ली हाईकोर्ट ने एम्स दिल्ली को उसके पूर्व कर्मी को 50 लाख रुपये देने का निर्देश दिया है, जिसे नौकरी से अवैध रूप से निकाल दिया गया था। एम्स द्वारा 1980 के दशक में ड्राइवर के पद पर नियुक्त किए गए राज सिंह को पेंशन के तौर पर हर महीने 19,900 रुपये भी मिलेंगे।
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विस्तार

दिल्ली हाईकोर्ट ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली को उसके पूर्व कर्मी को 50 लाख रुपये देने का निर्देश दिया है, जिसे नौकरी से अवैध रूप से निकाल दिया गया था। एम्स द्वारा 1980 के दशक में ड्राइवर के पद पर नियुक्त किए गए राज सिंह को पेंशन के तौर पर हर महीने 19,900 रुपये भी मिलेंगे।

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याचिकाकर्ता के अनुसार, उन्हें अवैध रूप से नौकरी से निकाले जाने के बाद वे लेबर कोर्ट गए थे। लेबर कोर्ट ने 1998 में नौकरी से हटाने को अवैध बताया था। उन्होंने अपनी याचिका में बताया कि लेबर कोर्ट के आदेश को विभिन्न फोरमों में चुनौती दी गई और आखिर में एम्स द्वारा दायर विशेष अवकाश याचिका (एसएलपी) को तीन जून 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था।


राज सिंह ने अधिवक्ता बीटी कौल के माध्यम से एम्स को कानूनी नोटिस भेजकर आदेश का अनुपालन करने और रुपयों का भुगतान करने की मांग की थी, लेकिन भुगतान नहीं किया गया। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।

न्यायाधीश प्रतिभा एम सिंह ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को चार दिसंबर 1998 से सेवानिवृत्ति की तारीख 31 अक्तूबर 2016 तक के वेतन, छुट्टियों और ग्रेच्युटी के रूप में 50,49,079 रुपये का भुगतान किया जाए। न्यायाधीश ने निर्देश दिया कि 19,900 रुपये मासिक पेंशन के रूप में प्रति महीने भुगतान किया जाए। एम्स ने राशि का मूल्यांकन कर कोर्ट को सूचित किया था। हालांकि गणना का आधार अभी भी स्पष्ट नहीं हुआ है।

एम्स अधिकारियों की तरफ से अधिवक्ता सोनाली मल्होत्रा ने कोर्ट को बताया कि वादी को कर्मचारी स्वास्थ्य स्कीम का जीवनभर लाभ उठाने के लिए अभी 30,000 रुपये का भुगतान भी करना है। इस पर कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता वर्तमान याचिका पर लंबे समय से संघर्ष कर रहा है, इसे देखते हुए ये 30,000 रुपये भी उनकी तरफ से एम्स को ही जमा करने होंगे।

कोर्ट ने कहा कि पूरी राशि का भुगतान 30 अक्तूबर तक जारी हो जाए और इसकी पुष्टि करते हुए एक एफिडेबिट 15 नवंबर तक जमा किया जाए। कोर्ट ने वादी के वकील को निर्देश दिए कि वे वादी के बैंक खातों की जानकारी एम्स के वकील को दे दें।
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