शिवमंगल सिंह 'सुमन' की कविता को अटल बिहारी की बताकर धीरज बंधा रहे भाजपा नेता
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दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की करारी हार हुई है। पार्टी लगातार दूसरी बार भी दहाई के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी है। ऐसे समय में भाजपा नेता एक कविता ‘क्या हार में, क्या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं’ सुनाकर, ट्वीट कर एक दूसरे को धीरज बंधा रहे हैं।
कुछ भाजपा नेता इसे अपने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविता बता रहे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि यह कविता हिंदी साहित्य के शीर्ष कवियों में से एक शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ ने रची थी। यह कविता बहुत प्रसिद्ध हुई थी। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहार को यह कविता बहुत प्रिय थी और वे कई बार सार्वजनकि मंचों से इसे दुहरा चुके हैं।
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स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी भी एक प्रसिद्ध कवि थे। यही वजह है कि कुछ लोग इसे अटल बिहारी वाजपेयी की ही कविता समझ बैठते हैं जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है।
शिवमंगल सिंह सुमन की वह पूरी कविता इस प्रकार है-
यह हार एक विराम है
जीवन महासंग्राम है
तिल-तिल मिटूंगा पर दया की भीख मैं लूंगा नहीं
वरदान मांगूंगा नहीं
स्मृति सुखद प्रहरों के लिए
अपने खंडहरों के लिए
यह जान लो मैं विश्व की संपत्ति चाहूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही
वरदान माँगूँगा नहीं
लघुता न अब मेरी छुओ
तुम हो महान बने रहो
अपने हृदय की वेदना मैं व्यर्थ त्यागूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं
चाहे हृदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं