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नशा तस्कर गिरफ्तार : तैमूर उर्फ भोला ग्रामीणों को रुपये देकर करता था मदद...

Mon, 20 Sep 2021 04:43 AM IST
दुष्यंत शर्मा शुजात आलम, नई दिल्ली
शुजात आलम, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Mon, 20 Sep 2021 04:43 AM IST
सार

इसीलिए आसपास के 15-20 गांवों के लोग बने हुए थे कुख्यात नशा तस्कर की ढाल और उनकी ही मदद से 9 साल तक यूपी और दिल्ली पुलिस की आंखों में झोंकता रहा धूल। 

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Taimur aka Bhola used to help the villagers by giving them money.
गिरफ्त में आरोपी... - फोटो : amar ujala

विस्तार

उत्तर भारत का बड़ा ड्रग तस्कर कुख्यात तैमूर उर्फ भोला आसपास के 15-20 गांवों के लोगों की मदद से पुलिस से बचता था। बदले में वह लाखों रुपये देकर ग्रामीणों की मदद करता था। हालत यह थी कि दिल्ली-हरियाणा नंबर वाली या पुलिस की गाड़ियां देखते ही गांव के बच्चे खेल-खेल में शोर मचाने लगते थे ‘देखो-देखो भोला भाग गया’। इससे नशा तस्कर के साथी सतर्क हो जाते और वह भाग निकलता। ग्रामीणों का साथ मिलने से ही वह करीब 9 साल से दिल्ली और यूपी पुलिस की आंखों में धूल झोंक रहा था।

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दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि तैमूर की गिरफ्तारी से दिल्ली और यूपी के नौ मामले सुलझे हैं। इसके खिलाफ नशे का धंधा करने के अलावा यूपी में गुंडा एक्ट का भी मामला दर्ज है। दिल्ली पुलिस के सूत्रों के मुताबिक, अब भोला के खिलाफ मकोका का मामला दर्ज किया जा सकता है। बरेली के फरीदपुर में बेहड़ा गांव के किसान का बेटा तैमूर पढ़ाई में अच्छा था। बरेली विश्वविद्यालय से बीए करने के बाद उसने वहीं के फ्यूचर कॉलेज में एमबीए में दाखिला ले लिया। वह पढ़ाई पूरी कर विदेश जाने के सपने देखने लगा। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण उसे पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी।
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इसके बाद उसकी मुलाकात 2007 में गांव के ही एक बड़े हेरोइन तस्कर से हुई। उसके कहने पर तैमूर हेरोइन लेकर बरेली से दिल्ली आने लगा। हर ट्रिप पर उसे 1600 रुपये मिलते थे। वर्ष 2008 में उसे वेलकम से दिल्ली पुलिस ने दबोच लिया। सात माह जेल में रहने के बाद वह निकला और दोबारा इसी धंधे में लग गया। वह पुलिस की वजह से कभी मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं करता था। वह अपने ही गांव के आशिक खान उर्फ आशिक प्रधान व शाहिद खान उर्फ छोटे खान उर्फ छोटे प्रधान से माल लेने लगा। आशिक को स्पेशल सेल और छोटे को यूपी पुलिस ने दबोच लिया। बाद में वह पश्चिम बंगाल, झारखंड व नॉर्थ-ईस्ट के दूसरे राज्यों से अफीम मंगाकर खुद ही हेरोइन बनाकर बेचने लगा। इसकी वजह से उसकी स्थानीय ड्रग सप्लायरों से रंजिश भी हो गई।
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गन्ने के खेतों में छिपकर काटता था फरारी का दौर
तैमूर ग्रामीणों की मदद से जब पुलिस से बच निकलता तो उसके बाद काफी दिन तक लापता हो जाता था। इस दौरान वह बाहर तक नहीं निकलता था। इस दौर में वह या तो गन्ने के खेतों में छिपा रहता था या फिर लखीमपुर खीरी स्थित अपनी ससुराल में जाकर रहता था। तैमूर के मीठे बोल के कारण लोग उसके जाल में फंस जाते थे। उसकी मोटी कमाई देखकर आसपास के कई गांवों के युवा उससे प्रभावित थे।

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