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Delhi News: गोबर और जैविक कचरे से बनेगी सीबीजी व बिजली

Sun, 12 Jul 2026 06:29 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Sun, 12 Jul 2026 06:29 PM IST
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CBG and electricity will be produced from cow dung and organic waste.
पूर्वी दिल्ली में 300 टीपीडी का नया बायोगैस प्लांट बनेगा
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विनोद डबास
नई दिल्ली। यमुना नदी में प्रदूषण कम करने, जैविक कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में एमसीडी ने बड़ा फैसला लिया है। मयूर विहार फेज-3 के घड़ौली विस्तार स्थित एकीकृत माल ढुलाई परिसर, गाजीपुर के सामने लगभग 5.2 एकड़ भूमि पर 300 टन प्रतिदिन (टीपीडी) क्षमता का अत्याधुनिक बायोगैस संयंत्र स्थापित करने को मंजूरी दी गई है। इस परियोजना पर लगभग 45 करोड़ रुपये की लागत आएगी और इसे सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) के तहत डिजाइन, निर्माण, वित्त, संचालन एवं हस्तांतरण (डीबीएफओटी) मॉडल पर विकसित किया जाएगा। संयंत्र में मुख्य रूप से डेयरियों और गोशालाओं से निकलने वाले गोबर के साथ अन्य जैव-अपघटनीय (बायोडिग्रेडेबल) कचरे का वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्करण किया जाएगा। इससे संपीड़ित बायोगैस (सीबीजी) और बिजली का उत्पादन होगा। एमसीडी का मानना है कि इससे खुले नालों में गोबर और जैविक कचरा जाने की समस्या पर रोक लगेगी, जिससे यमुना नदी में जैविक प्रदूषण कम होगा और जल गुणवत्ता में सुधार आएगा।
एमसीडी के अनुसार, दिल्ली में बड़ी मात्रा में डेयरियों और अनौपचारिक गोशालाओं से निकलने वाले गोबर का अभी तक वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण नहीं हो रहा है। इसका अधिकांश हिस्सा नालों के माध्यम से यमुना तक पहुंच जाता है, जिससे बदबू, जलभराव और नदी में जैविक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) बढ़ने जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए यह परियोजना तैयार की गई है। यह परियोजना मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में गठित उच्च स्तरीय समिति की निगरानी में की जा रही यमुना पुनरुद्धार अभियान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे पहले नंगली डेयरी में 200 टीपीडी क्षमता का बायोगैस संयंत्र शुरू किया जा चुका है, जबकि गोयला और घोघा डेयरी में भी 200-200 टीपीडी क्षमता के दो संयंत्र निर्माणाधीन हैं। परियोजना के तहत चयनित कंपनी डेयरी मालिकों, गोशालाओं और आवश्यकता पड़ने पर सब्जी मंडियों जैसे बड़े अपशिष्ट उत्पादकों से जैविक कचरा एकत्र कर उसका प्रसंस्करण करेगी। संयंत्र पूरी तरह स्वचालित होगा और एससीएडीए आधारित रियल टाइम मॉनिटरिंग प्रणाली से संचालित किया जाएगा।
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एमसीडी इस परियोजना के लिए स्थापना लागत का 18 प्रतिशत यानी लगभग 8.1 करोड़ रुपये व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (वीजीएफ) के रूप में देगी। कंपनी का चयन एकल चरण की दो-बोली प्रणाली से किया जाएगा। परियोजना को कार्यादेश मिलने के 740 दिनों के भीतर पूरा करना होगा। इसकी रियायत अवधि 20 वर्ष होगी, जिसे आपसी सहमति से दो बार पांच-पांच वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकेगा। स्थायी समिति की अध्यक्ष सत्या शर्मा का कहना है कि इस परियोजना से जैविक कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण, स्वच्छ ईंधन और बिजली का उत्पादन, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी और यमुना को प्रदूषण से राहत देने में महत्वपूर्ण मदद मिलेगी।
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