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उपहार अग्निकांड: साक्ष्यों को नष्ट करने के मामले में पीड़ितों ने अंसल के गवाह को दोबारा बुलाने की याचिका पर जताई आपत्ति

Wed, 15 Sep 2021 06:00 PM IST
प्राची प्रियम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: प्राची प्रियम Updated Wed, 15 Sep 2021 06:00 PM IST
सार

दिल्ली उच्च न्यायालय में उपहार कांड पीड़ित संघ ने बुधवार को रियल एस्टेट कारोबारी सुशील अंसल की उस अर्जी का विरोध किया जिसमें जांच अधिकारी के वकील बदले जाने से उत्पन्न स्थिति में उनसे जिरह करने की अनुमति मांगी गई है।

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Ansal plea to cross examine witness attempt to delay trial in evidence tampering case says AVUT
उपहार अग्निकांड - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उपहार अग्निकांड पीड़ित एसोसिएशन ने मुख्य उपहार अग्निकांड मामले में सबूतों से छेड़छाड़ से संबंधित मामले में मुकदमे का सामना कर रहे रियल एस्टेट कारोबारी सुशील अंसल की उस याचिका पर आपत्ति जताई है जिसमें जांच अधिकारी से पुन: जिरह करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि आरोपी ने वकील बदलकर जानबूझ कर सुनवाई में देरी करने का प्रयास किया है।

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न्यायमूर्ति योगेश खन्ना के समक्ष एसोसिएशन के अधिवक्ता ने कहा कि यह याचिका पूरी तरह से तुच्छ और अस्पष्ट है। अदालत ने उनके तर्क सुनने के बाद मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
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अंसल के वकील ने अदालत को बताया कि निचली अदालत ने सीआरपीसी की धारा 311 (सामग्री गवाह को बुलाने या मौजूद किसी व्यक्ति की जांच करने की शक्ति) के तहत उनकी याचिका का निपटारा कर दिया है जबकि वे जांच अधिकारी से जिरह करने के लिए एक और अवसर की मांग कर रहे हैं। 
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सुनवाई के दौरान एसोसिएशन अध्यक्ष नीलम कृष्णमूर्ति की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास पहवा ने दलील दी कि आरोपी के नए वकील ने रणनीतिक रूप से धारा 311 सीआरपीसी के तहत एक गवाह को वापस बुलाने के लिए आवेदन दायर किया है, जिससे पहले ही बड़े पैमाने पर उनका वकील जिरह कर चुका है।

उन्होंने कहा कि मुकदमे में पहले से ही काफी देरी हो चुकी है और देरी के कारण त्रासदी के पीड़ितों को कई बार उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर 2013 में आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करवाने के लिए और यहां तक कि 2018 में ट्रायल में तेजी लाने के लिए भी आग्रह करना पड़ा है। पहवा ने कहा कि उपहार त्रासदी 1997 में हुई थी, पहले ही देरी हो चुकी है और पीड़ितों को घटना के 24 साल बाद 2021 में आज भी न्याय का इंतजार है ।

उन्होंने कहा धारा 311 सीआरपीसी के असाधारण प्रावधान का उपयोग इस आधार पर गवाह को पुन: बुलाकर एक खामी को भरने के लिए नहीं किया जा सकता कि आरोपी के वकील में बदलाव किया गया है।

दिल्ली पुलिस ने भी याचिका का विरोध करते हुए कहा कि मुकदमा अपने अंतिम चरण में है क्योंकि अभियोजन और बचाव पक्ष के साक्ष्य पर सुनवाई पहले ही बंद हो चुकी है और निचली अदालत इस समय आरोपियों की ओर से अंतिम दलीलें सुन रही है।
अदालत ने हाल ही में 9 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान निचली अदालत में चल रही सुनवाई पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

यह मामला मुख्य मामले में साक्ष्य नष्ट करने का है। अंसल बंधुओं के साथ अदालत के कर्मचारी दिनेश चंद शर्मा और पी पी बत्रा, हर स्वरूप पंवार, अनूप सिंह और धर्मवीर मल्होत्रा इस मामले में आरोपी है वहीं आरोपी पंवार और मल्होत्रा की मौत हो गई।
आरोप है कि अदालत के कर्मचारी के सहयोग से आरोपियों ने फाइल से कई अहम दस्तावेजों व चैक को गायब कर दिया था।

मुख्य मामले में सुशील व गोपाल अंसल को दो वर्ष जेल की सजा सुनाई जा चुकी है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें पहले से ही जेल में काटी गई सजा के आधार पर इस शर्त पर रिहा कर दिया था कि वे राष्ट्रीय राजधानी में ट्रामा सेंटर बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले 30 करोड़ रुपये के जुर्माने का भुगतान करेंगे।
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