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दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी : विवाहेत्तर संबंध के आरोप पति-पत्नी के चरित्र पर गंभीर हमला, बताया क्रूरता के बराबर

Thu, 24 Mar 2022 03:59 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 24 Mar 2022 03:59 AM IST
सार

एक महिला की अपील को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय की टिप्पणी।

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allegations of extramarital affair serious attack on the character of husband and wife says delhi high court
दिल्ली हाईकोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

उच्च न्यायालय ने माना कि अपवित्रता या विवाहेत्तर संबंध के निराधार आरोप पति या पत्नी के चरित्र, प्रतिष्ठा और स्वास्थ्य पर एक गंभीर हमला है जो मानसिक पीड़ा का कारण बनता है। यह क्रूरता के बराबर है और तलाक का भी आधार है।

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कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायाधीश दिनेश कुमार शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि विवाहेतर संबंधों के आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और इन्हें पूरी गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
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पीठ ने परिवार न्यायालय दक्षिण पश्चिम द्वारका के फैसले को चुनौती देने वाली पत्नी द्वारा दायर एक अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। फैमिली कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 (1) (आईए) के तहत पति के पक्ष में तलाक का आदेश दिया था। कोर्ट ने महिला के आरोपों को निराधार माना।
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महिला ने आरोप लगाया कि उसके पति के विवाहेत्तर संबंध थे, वह आदतन शराब पीता है और यहां तक कि उसे आत्महत्या करने के लिए भी मजबूर करता है। महिला ने अपने ससुर पर उसका यौन शोषण करने का आरोप लगाते हुए कहा कि परिवार के अन्य सदस्य उसे दहेज की मांग को लेकर परेशान कर रहे थे। फैमिली कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर विचार करने के बाद अपने फैसले में कहा कि हालांकि, विवाहेतर संबंधों के आरोप लगाए गए है, लेकिन दावे का समर्थन करने के लिए कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया जा सका। अदालत ने कहा था कि पत्नी द्वारा मानसिक क्रूरता के लगाए आरोपों में कोई दम नहीं है।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट को यह भी बताया गया कि इस अपील के लंबित रहने के दौरान पति के पिता को भी उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी में बरी कर दिया गया है। पीठ ने कहा कि हालांकि पत्नी ने अपने पति के खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाए लेकिन उनकी पुष्टि नहीं हुई और अपने ससुर के खिलाफ दायर शिकायत के परिणामस्वरूप भी बरी हो गई।

कोर्ट ने कहा विवाह एक पवित्र रिश्ता है और स्वस्थ समाज के लिए इसकी पवित्रता बनाए रखनी चाहिए। ऐसे में बिना ठोस साक्ष्यों के फैमिली कोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है। लिहाजा अपील खारिज की जाती है।

तलाक के लिए दंपती को कानूनी बंधन में बांधना जीवन का अवसर छीनना
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी भी दंपती को कानूनी बंधन से बांधे रखने का मतलब उनसे एक पूर्ण जीवन का अवसर छीनना होगा। अदालत ने आपसी सहमति से तलाक की मांग करने वाले दंपती को कानून के तहत छह महीने की कूलिंग ऑफ अवधि को माफ करते हुए यह टिप्पणी की। न्यायमूर्ति विपिन सांघी और न्यायमूर्ति दिनेश कुमार शर्मा की पीठ ने कहा कि इस मामले में पुरुष और महिला दोनों अच्छी तरह से शिक्षित और स्वतंत्र व्यक्ति हैं जिन्होंने पारस्परिक रूप से अपनी शादी के भाग्य का फैसला किया है। 

वे एक ऐसी उम्र में हैं जहां अवसर दिए जाने पर वे एक नया जीवन शुरू कर सकते हैं। अदालत ने यह टिप्पणी पारिवारिक अदालत के उस आदेश को रद्द करते हुए की जिसमें हिंदू विवाह अधिनियम के तहत पार्टियों द्वारा संयुक्त रूप से पेश की गई दूसरी याचिका को खारिज कर दिया था। अदालत ने कहा था कि तलाक के लिए पहला आवेदन किए जाने की तारीख से छह महीने की वैधानिक अवधि और अवधि अलगाव की तारीख से 18 महीने की अवधि समाप्त नहीं हुई है। 


विवाहित जोड़े को सुरक्षा देने का निर्देश
उच्च न्यायालय ने बुधवार को पुलिस को प्रेम विवाह करने वाले जोड़े को सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश दिया है। दोनों ने परिवार से जान को खतरा बताया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और न्यायमूर्ति नवीन चावला की पीठ के समक्ष महिला ने बताया कि उसकी और उस शख्स की शादी नवंबर 2021 में हुई थी। यह शादी उनके परिवारों को मंजूर नहीं थी और अब उसके पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। 
 

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