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Delhi News : काबुल से दिल्ली पहुंचा सिखों का जत्था, अपनों से मिलने पर आंखें हुईं नम, नहीं छिपा सके गम
Fri, 15 Jul 2022 04:53 AM IST
दुष्यंत शर्मा
सर्वेश कुमार, नई दिल्ली
सर्वेश कुमार, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Fri, 15 Jul 2022 04:53 AM IST
सार
अपने रिश्तेदारों को देखकर उनकी नजरें तो चमकीं और चेहरे पर हल्की मुस्कान भी आई, लेकिन पलायन का दर्द नहीं छिपा सके।
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दिल्ली पहुंचे लोगों का कहना है कि अब जुल्म बर्दाश्त नहीं होता...
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अफगानिस्तान के मौजूदा हालात से खौफजदा 21 सिखों का दूसरा जत्था बृहस्पतिवार दोपहर दिल्ली पहुंचा। आईजीआई एयरपोर्ट पर आखें उनकी नम थीं। अपने रिश्तेदारों को देखकर उनकी नजरें तो चमकीं और चेहरे पर हल्की मुस्कान भी आई, लेकिन पलायन का दर्द नहीं छिपा सके। अपनी मातृभमि, लाखों की जायदाद छोड़कर भारत की जमीं पर पहुंचने पर वह खुद को महफूज महसूस कर रहे थे। फिर भी, अनिश्चित भविष्य की फिक्र उन्हें सता रही थी।
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दरअसल, पिछले महीने काबुल के एक गुरुद्वारे के ग्रंथी की हत्या और सिख समुदाय को मिल रही प्रताड़ना की सूचनाओं के बीच शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने अपने खर्च पर सिखों को भारत लाने की कोशिश की। केंद्र सरकार की ओर से प्रभावितों को सुरक्षित लाने के लिए ई-वीजा का प्रावधान किया है। पिछले दिनों 11 सिखों का जत्था दिल्ली पहुंचा था। 21 सदस्यों का दूसरा समूह बृहस्पतिवार दिल्ली पहुंचा। वहीं, सिख परिवारों के 60 से अधिक सदस्य अभी ई-वीजा मिलने के इंतजार में हैं।
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दिल्ली पहुंचे लोगों का कहना है कि अब जुल्म बर्दाश्त नहीं होता। अलगाववादी गुटों के बीच फंसे सिख समुदाय के लिए चैन की नींद तो दूर, खुली हवा में सांस लेने का भी मौका कई महीनों से नहीं मिला। तालिबान के कब्जे के बाद से लगातार अफगानिस्तान में सिखों के साथ हो रहे बर्ताव से आहत लोग इतने खौफजदा हैं कि जुबां से हकीकत निकलने में काफी वक्त लग रहा था।
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अफगानिस्तान में रहने लायक माहौल नहीं : राजिंदर सिंह ने बताया कि फिलहाल उनका कोई नहीं बचा है। काबुल में अभी भी परिवार के सात सदस्य फंसे हुए हैं। अब यही दुआ कि सभी सुरक्षित आ जाएं, क्योंकि वहां के हालात अब रहने लायक नहीं है। हालात चाहे कितने भी क्यों न बदल जाए, वहां नहीं लौटेंगे। काबुल के एक गुरुद्वारा परिसर में हुए हमले में एक सिख समेत दो लोगों की मौत हो गई थी। वहां से आए सिखों ने कहा कि वहां कभी भी हमला कर दिया जाता है। वो नहीं चाहते हैं कि एक भी सिख रहे।
जीने के लिए नहीं बचा था पलायन के अलावा कोई रास्ता
राजिंदर के एक दोस्त ने बताया कि उनके साथ काम करने वाले पार्टनर दूसरे समुदाय के थे। जैसे ही सुना कि देश छोड़कर जा रहे हैं, रोकने लगे और जब बताया कि यह आखिरी फैसला है तो वे रोने लगे। अलगाववादियों को छोड़कर कुछ ऐसे लोग अभी भी हैं, जो नहीं चाहते हैं कि हम देश छोड़ें। पहले की बात याद करते हुए राजिंदर ने कहा कि उनके पिता और दादा के पास अफगान मूल के लोग वहां की मुद्रा जमा कर जाते थे। उन्हें बहुत अधिक विश्वास था, लेकिन अब उसी देश में उनके लिए हालात रहने लायक नहीं हैं। मुल्क को छोड़ने का गम वह नहीं भूल सकते, जीने के लिए कोई और रास्ता भी नहीं बचा।
अपनों का इंतजार कर रहे हैं कुलदीप
61 वर्षीय कुलदीप सिंह ने कहा कि दहशतगर्दी के बीच सिखों के लिए वहां रहना खतरे से खाली नहीं है। परिवार के सभी सदस्यों के साथ लौटने की तैयारी कर ली, लेकिन सभी का वीजा तैयार नहीं होने के कारण अभी भी वहां फंसे परिजनों के लौटने का इंतजार है। अभी भी उनकी बहू और बेटे फंसे हैं। उनके पहुंचने के बाद ही चैन की नींद सो सकेंगे। दिल्ली पहुंचने पर सुकून मिला, लेकिन अब रोजाना दिन-रात इंतजार में बीतेंगे।
लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा शरबत
नौ महीने का नौनिहाल अफगानिस्तान के मौजूदा हालात से नावाकिफ बेफिक्र अंदाज में दिखा। बृहस्पतिवार को पहुंचने वाले समूह के सबसे छोटे सदस्य शरबत सिंह इंसानियत की मिठास बांटता रहा। उसे देखते ही हर किसी ने गोद ले लिया।
तिलक नगर स्थित काबुली गुरुद्वारा पहुंचने पर लोगों के चेहरे पर थकान और खौफ के साथ दिल्ली पहुंचने का सुकून दिखा। शरबत के पिता गोबिंद सिंह ने बताया कि वहां उनकी दुकान थी, लेकिन अब उनके पास कुछ नहीं है। अपनी पत्नी जसलीन कौर, भाभी व भतीजे के साथ पहुंचे गोबिंद ने कहा कि परिवार के आठ सदस्य अभी भी काबुल में फंसे हैं। वहां कई महीनों से सुकून का पल नहीं बिता सके। शेष परिजनों के महफूज भारत पहुंचने का इंतजार है।
कारोबार में 40 लाख रुपये बर्बाद हुए
दवाइयों के कारोबारी राजिंदर सिंह ने अपनी पीड़ा बयां करते हुए कहा कि अब उनके पास चंद रुपयों के अलावा कुछ नहीं है। अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा होने से महज तीन दिन पहले बैंक में करीब 40 लाख रुपये जमा करवाए थे। इसके बाद बैंक दिवालिया घोषित कर दिए गए और उनके रकम डूब गई। काबुल में बिताए पिछले कुछ महीनों का जिक्र करते हुए राजिंदर ने कहा कि उस पल को अब याद नहीं करना चाहते हैं।
जिस मुल्क में जन्म लिया, अग्रणी स्कूल से 12वीं तक की पढ़ाई के बाद कारोबार करने लगे। अब उसी देश में सिखों के लिए मुश्किलें इतनी बढ़ गईं कि रहना नहीं चाहते। सिखों के दिखने पर ही उनके साथ अलगाववादियों का गुट कभी भी हमला कर देता है।