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तीसरी लहर से पहले ही अस्पतालों में 80 फीसदी बेड भरे

Thu, 12 Aug 2021 02:06 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Thu, 12 Aug 2021 02:06 AM IST
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80 percent beds filled in hospitals even before the third wave
नई दिल्ली। कोरोना की तीसरी लहर आने से पहले ही दिल्ली के सरकारी और प्राइवेट अस्पताल गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। अस्पतालों में 80 फीसदी तक बेड भर चुके हैं। यहां न सिर्फ कोरोना संक्रमित बल्कि पोस्ट कोविड और नॉन कोविड मरीज भी भर्ती हो रहे हैं जिसके चलते मरीजों की संख्या काफी तेजी से बढ़ गई है। एम्स सहित सरकारी अस्पतालों की बात करें तो यहां मरीजों के लिए वेटिंग भी काफी बढ़ चुकी है।
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अमर उजाला ने जब राजधानी के तमाम बड़े सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों की पड़ताल की तो पता चला कि ज्यादातर मरीज बाहरी राज्यों से आ रहे हैं। इनमें से कई मरीज ऐसे भी हैं जिन्हें बार-बार लॉकडाउन के चलते उपचार समय पर नहीं मिला और हालत गंभीर होने पर अब अस्पतालों में भर्ती करना पड़ा है।
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मैक्स, अपोलो और फोर्टिस सहित बड़े प्राइवेट अस्पतालों में आईसीयू बेड भी इन दिनों लगभग भर गए हैं। यह स्थिति तब है जब कोरोना को लेकर दिल्ली सरकार का आंकड़ा हर दिन 50 से 60 के बीच सामने आ रहा है। इन आंकड़ों की मानें तो दिल्ली में कोरोना संक्रमण के मामले पहले की तुलना में न के बराबर मिल रहे हैं।
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आंकड़ों की बात करें तो दिल्ली में करीब 200 अस्पताल हैं, जहां बेड की क्षमता 20 हजार से अधिक है। इनमें से 16,636 बेड कोविड के लिए आरक्षित हैं जिनमें से दिल्ली सरकार के अनुसार 16,325 बेड खाली हैं, जबकि अस्पतालों में 80 फीसदी तक बेड को भरा बताया जा रहा है। कई अस्पतालों के आईसीयू में 90 से 95 फीसदी तक बिस्तरों पर मरीज भर्ती हैं।
ज्यादातर मरीज गंभीर बीमारियों से ग्रस्त
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के अनुसार, मरीजों की संख्या ज्यादातर सुपर स्पेशलिटी से जुड़े विभागों में है। हार्ट, किडनी, फेफड़े, लिवर और कैंसर इत्यादि के मरीज सबसे अधिक संख्या में भर्ती हैं। एम्स में रोगियों की जांच को लेकर भी लंबी वेटिंग चल रही है। एमआरआई से लेकर बायोप्सी इत्यादि तक के लिए मरीजों को कई दिन तक की तारीख मिल रही है। यहां तक कि ग्लूकोमा मरीजों के लिए भी एक से दो महीने की वेटिंग जांच के लिए दी जा रही है।
देरी से पहुंच रहे मरीज, महामारी से पड़ा असर
मैक्स, अपोलो, फोर्टिस, इंडियन स्पाइन इंजरी सेंटर सहित लगभग सभी बड़े अस्पतालों से जानकारी मिली है कि उनके यहां बिस्तरों की संख्या अधिकांश फुल जा रही है। कोविड मामले कम होने के चलते आरक्षित बिस्तरों की संख्या कम कर दी है, लेकिन पोस्ट कोविड के मामले काफी तेजी से बढ़ रहे हैं। साकेत स्थित मैक्स अस्पताल के एक डॉक्टर ने यहां तक बताया कि जिन मरीजों को गंभीर हालत में भर्ती किया जा रहा है उनमें ज्यादातर ऐसे हैं जिन्हें समय पर इलाज नहीं मिला। इन्हें दवाएं भी नहीं मिल पाईं जिसके चलते इनकी तबियत और अधिक खराब हुई है। महामारी का यह असर सिर्फ अस्पतालों में ही दिखाई दे सकता है।
नई लहर आई तो अस्पतालों के लिए होगी मुसीबत
डॉक्टरों का कहना है कि भविष्य में जब भी कोरोना की लहर आती है तो दिल्ली के अस्पतालों के लिए यह किसी मुसीबत से कम नहीं होगी, क्योंकि इनके पास मौजूदा बिस्तरों की संख्या उस दौरान कम पड़ सकती है। कुछ अस्पताल अपोलो और मैक्स इसे लेकर नई रणनीति पर काम भी कर रहे हैं, ताकि समय रहते बिस्तरों का प्रबंधन किया जा सके।

एम्स सहित कई अस्पतालों में बढ़ी मृत्युदर
कोरोना महामारी ने एम्स सहित दिल्ली के कई बड़े सरकारी अस्पतालों में मृत्युदर भी बढ़ा दी है। स्थिति यह है कि एम्स में भर्ती साल 2018 और 2019 में क्रमश: 37 और 34 मरीजों पर एक की मौत दर्ज की गई, जबकि साल 2020 से स्थिति ऐसी है कि अब हर 20 या फिर 21वें मरीज की मौत हो रही है। सबसे गंभीर हालात कलावती सरन बाल अस्पताल के हैं, जहां जनवरी से लेकर जून तक 357 बच्चों की उपचार के दौरान मौत हो चुकी है। वहीं डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में हर 11वें मरीज की मौत हो रही है।
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