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Delhi: 650 करोड़ का दवा और उपकरण खरीद घोटाला, जांच से पहले दफ्तर छोड़ गए प्रभारी अधिकारी, फोन स्विच ऑफ

Tue, 07 Jul 2026 04:40 AM IST
Digvijay Singh धनंजय मिश्रा, अमर उजाला, नई दिल्ली
धनंजय मिश्रा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Digvijay Singh Updated Tue, 07 Jul 2026 04:40 AM IST
सार

टीम ने डॉ. रंगा से संपर्क करने की कोशिश की तो उनका मोबाइल फोन स्विच ऑफ मिला। मामले की गंभीरता देखते हुए विजिलेंस ने एक स्पेशल मैसेंजर उनके पश्चिम विहार स्थित आवास पर भेजा, लेकिन वहां मौजूद उनकी घरेलू सेविका ने बताया कि साहब घर पर नहीं हैं।

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650 crore drug and equipment purchase scam officer in charge left office before investigation in delhi
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली के स्वास्थ्य विभाग में करोड़ों रुपये के कथित खरीद घोटाले की जांच किसी फिल्मी पटकथा की तरह दिलचस्प है। सतर्कता विभाग की तरफ से तैयार की गई जांच रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि जब जांच टीम सबूत जुटाने पहुंची, तो मुख्य आरोपी अधिकारी रहस्यमयी तरीके से गायब हो गए और सरकारी रिकॉर्ड को निजी संपत्ति की तरह बंधक बना लिया गया। ऐसे में टीम को बैरंग लौटना पड़ा।

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सतर्कता निदेशालय की टीम 18 मई की दोपहर बाद करीब 4:30 बजे रिकॉर्ड जब्त करने के लिए स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) पहुंची। दस्तावेज मांगने पर डीजीएचएस की महानिदेशक डॉ. वत्सला अग्रवाल ने केंद्रीय खरीद एजेंसी (सपीए) के प्रभारी डॉ. विनोद कुमार रंगा को फोन किया।  डॉ. रंगा ने फोन पर पुष्टि की कि वह शकरपुर स्थित अपने कार्यालय में हैं। इस पर विजिलेंस टीम ने शकरपुर का रुख किया और पांच बजे वहां पहुंची तो पता चला कि डॉ. रंगा कुछ ही मिनट पहले दफ्तर छोड़कर चले गए हैं। 
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हैरानी की बात यह रही कि गायब होने के अगले ही दिन यानी 19 मई को यह जानकारी दी गई कि डॉ. रंगा मेडिकल लीव पर चले गए हैं। सतर्कता विभाग का कहना है कि सरकारी रिकॉर्ड किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं हो सकते और उन्हें इस तरह छिपाना सीधे तौर पर सबूतों के साथ छेड़छाड़ और जांच को प्रभावित करने की कोशिश है।
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फोन स्विच ऑफ, घर पर भी साहब नहीं मिले...
टीम ने डॉ. रंगा से संपर्क करने की कोशिश की तो उनका मोबाइल फोन स्विच ऑफ मिला। मामले की गंभीरता देखते हुए विजिलेंस ने एक स्पेशल मैसेंजर उनके पश्चिम विहार स्थित आवास पर भेजा, लेकिन वहां मौजूद उनकी घरेलू सेविका ने बताया कि साहब घर पर नहीं हैं। दफ्तर में मौजूद अन्य अधिकारियों डॉ. राजेश कुमार और डॉ. कुसुम अरोड़ा ने टीम को फाइलें देने से साफ मना कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि तमाम फाइलें डॉ. रंगा की व्यक्तिगत कस्टडी में हैं और उनकी अनुपस्थिति में उन्हें कोई नहीं छू सकता। विजिलेंस की रिपोर्ट में इसे स्टोन वॉलिंग (जांच में जानबूझकर अड़ंगा डालना) कहा गया है। टीम रात 10:15 बजे तक दफ्तर में रुकी रही लेकिन अधिकारियों ने फाइलों की सूची पर हस्ताक्षर तक करने से इनकार कर दिया। 


रिकॉर्ड के लिए 12 दिन तक जूझती रही विजिलेंस टीम
घोटाले की जांच में रिकॉर्ड जुटाना ही विजिलेंस विभाग के लिए बड़ी चुनौती बन गया। एफआईआर के अनुसार, 18 मई को शाम 4:30 बजे विजिलेंस टीम पहले डीजीएचएस कार्यालय और फिर शाम 5 बजे शकरपुर स्थित केंद्रीय खरीद एजेंसी (सीपीए) पहुंची। टीम रात 10:15 बजे तक कार्यालय में डटी रही, लेकिन महत्वपूर्ण रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराए गए। 19 मई को पहली बार लिखित रूप से रिकॉर्ड मांगे गए। 21 मई को दोबारा पत्र भेजकर दस्तावेज उपलब्ध कराने के लिए कहा गया। 25 मई को एक और पत्र जारी कर शाम पांच बजे तक सभी रिकॉर्ड सौंपने की समय-सीमा तय की गई, लेकिन आवश्यक दस्तावेज पूरे नहीं मिले। अंततः 29 मई को सतर्कता निदेशालय ने पूरे घटनाक्रम, रिकॉर्ड उपलब्ध न होने और जांच में सामने आई परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए मामला भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) को भेज दिया, जिसके आधार पर बाद में एफआईआर दर्ज की गई।

इन फाइलों को छिपाने की हुई कोशिश...
ओआरएस टेंडर: 2.5 के पैकेट को 15 में खरीदने से जुड़ी फाइल।
पोर्टेबल एक्स-रे मशीन: 10 लाख की मशीन को 33 लाख में खरीदने का रिकॉर्ड।
बेडशीट और लिनेन: अस्पतालों के लिए महंगे दामों पर की गई खरीद।
जीवन रक्षक उपकरण: एनेस्थीसिया स्टेशन और सी-आर्म मशीनों के टेंडर में धांधली।

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