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Lok Sabha Election: प्रचार में खलेगी दिग्गजों की कमी, दिल्लीवासियों को मंत्रमुग्ध कर देने वाली नहीं बची आवाज
Mon, 15 Apr 2024 11:07 AM IST
श्याम जी.
नवनीत शरण, अमर उजाला, नई दिल्ली
नवनीत शरण, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: श्याम जी.
Updated Mon, 15 Apr 2024 11:07 AM IST
सार
दिल्ली में जनता को मंत्रमुग्ध करने वाले नेता कम ही देखने को मिल रहे हैँ। पिछले लोकसभा चुनाव में सुषमा स्वराज, शीला दीक्षित और अरुण जेटली के राजनीतिक दांवपेच खूब देखने को मिले, लेकिन इस बार के लोकसभा चुनाव में ऐसा कोई नहीं है।
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अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और शीला दीक्षित
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहा है राजनीतिक पार्टियों के हर तरकश से शब्दों के बाण चल रहे हैं। लेकिन दिल्लीवासियों को मंत्रमुग्ध कर देने वाली वह सुरीली आवाज सुनने को नहीं मिल रही है, जिसके दिल्ली वाले दीवाने रहते थे। आंकड़ों के गणित पर नपे-तुले अंदाज में समझाने वाले नेता भी नहीं हैं।
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दरअसल, पिछले लोकसभा चुनाव में सुषमा स्वराज, शीला दीक्षित और अरुण जेटली के राजनीतिक दांवपेच खूब देखने को मिले। शीला दीक्षित खुद उत्तर-पूर्वी दिल्ली से चुनाव लड़ी थीं। इसी तरह सुषमा स्वराज भी भाजपा प्रत्याशियों के लिए दिल्ली की गलियों की खाक छानती थीं। स्टार प्रचारक के तौर पर लोकसभा या विधानसभा चुनाव सुरीले भाषण से जनता का मन मोह लेती थीं। अरुण जेटली दिल्ली से कभी चुनावी मैदान में तो नहीं उतरे, लेकिन भाजपा प्रत्याशियों को आंकड़ों का गणित जरूर समझाते रहते थे। प्रत्याशियों के चयन में भी उनकी मुख्य भूमिका रहती थी।
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चुनाव प्रचार कमेटी भी लोकसभा व विधानसभा क्षेत्र में प्रचार की कमान सौंपती थी। इन नेताओं का दबदबा किसी एक वर्ग में नहीं, बल्कि हर वर्ग में रहता था। इस बार सभी वर्ग को साधने वाले इन दिग्गजों की कमी महसूस होगी। पंजाबी समुदाय के अलावा जेटली का व्यापारी, वकील, सीए सहित कई वर्ग के लोगों में प्रभाव था। हरियाणा की मूल निवासी रहीं सुषमा स्वराज पूरी दिल्ली की दीदी थीं। दिल्ली के दिवंगत मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना की एक आवाज पर पंजाबी वर्ग एकजुट हो जाता था तो साहिब सिंह वर्मा की आवाज पर ग्रामीण आबादी। शीला दीक्षित के निधन के बाद कांग्रेस पार्टी में भी उनके कद का कोई ऐसा नेता नहीं बचा है, जो पंजाबियों के बीच साख रखता हो।
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