'राष्ट्रपति को आदेश नहीं दे सकती सुप्रीम कोर्ट'
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दिल्ली में बदले राजनीतिक हालात पर अब एक नई बहस छिड़ गई है। विधानसभा भंग करने के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और उपराज्यपाल को कड़ी फटकार लगाई तो इस पर केंद्र ने कोर्ट के कार्यक्षेत्र को चुनौती दे डाली है।
अदालत की ओर से तीखे सवाल किए जाने के बाद केंद्र सरकार ने कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट का मुद्दा नहीं है कि दिल्ली में सरकार बने या फिर चुनाव हों। यह तय करने का हक सिर्फ राष्ट्रपति के पास है।
बता दें कि मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व उपराज्यपाल को कड़ी फटकार लगाते हुए सवाल किया था कि अगर दिल्ली में सरकार ही बनानी थी तो वे पिछले 8 महीने से क्या कर रहे थे? अगर भाजपा सरकार बनाएगी भी तो कैसे?
सुप्रीम कोर्ट नहीं तय करती समय सीमा
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में जनता को चुनी हुई सरकार का हक है। राष्ट्रपति शासन हमेशा के लिए जारी नहीं रखा जा सकता।
आम आदमी पार्टी के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि केंद्र की ओर से उपराज्यपाल को दिल्ली में सरकार बनाने की संभावना तलाशने की मंजूरी देने से एक गलत परंपरा बनेगी और इससे खरीद-फरोख्त को बढ़ावा मिलेगा।
चीफ जस्टिस एचएल दत्तू और जस्टिस जे चेलमेश्वर, एके सिकरी, आरके अग्रवाल और अरुण मिश्र की पीठ ने केंद्र की ओर से की जा रही लेटलतीफी पर नाराजगी जताई। इस पर अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पीएस नरसिम्हा ने कोर्ट से कहा कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का पालन कर रही है जिसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति को सरकार के गठन की सभी संभावनाएं खंगालनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि सरकार बनाने के लिए जरूरी संवैधानिक प्रक्रिया लगातार चल रही है और इस मामले में अदालत कोई समय सीमा नहीं निर्धारित कर सकती। केंद्र सरकार की ओर रखे गए जवाब का भाजपा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल ने भी समर्थन किया और 'आप' की ओर से लगाए गए आरोपों के खिलाफ दलीलें पेश कीं।
BJP के वकील ने कोर्ट पर उठाए सवाल
वेणुगोपाल ने कहा कि संवैधानिक रुप से राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि जब कोई भी पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं हो तो वह एक साल तक विधानसभा को निलंबित रख सकते हैं।
यह एक साल का समय अब जल्द ही समाप्त होने वाला है। ऐसे में अदालत यह कैसे कह सकती है कि राष्ट्रपति को बिना सरकार बनने की संभावनाएं तलाशे हुए विधानसभा भंग कर देनी चाहिए। क्या एक साल पूरा होने से पहले अदालत को इस मामले में हस्तक्षेप करने का अधिकार है?
जब कोर्ट ने सवाल उठाया कि केंद सरकार मामले को सुलझाने के लिए बार-बार समय क्यों मांग रही है? तो इस पर वेणुगोपाल ने कहा कि विधानसभा भंग करने के संबंध में कोर्ट राष्ट्रपति को इस मामले में कोई आदेश नहीं दे सकती।
'ये हक सिर्फ राष्ट्रपति को है'
भाजपा की ओर से पेश हुए दूसरे वकील अमन सिन्हा ने कहा कि आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा भंग करने के संबंध में लगातार ऊहापोह की स्थिति बनाए रखी, जबकि पार्टी के पास दोबारा चुनाव कराने के लिए निर्देश देने का कोई अधिकार नहीं है।
इस पर नरसिम्हा ने कहा कि उन्होंने कोर्ट से समय लिया था ताकि वह केंद्र सरकार को यह बता सकें कि पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट की राय क्या है। वैसे भी यह कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर का विषय है और सिर्फ राष्ट्रपति को हक है कि वे तय करें कि कब क्या करना है।
इस पर कोर्ट ने 'आप' के अधिवक्ता प्रशांत भूषण से सवाल किया कि क्या अदालत राष्ट्रपति से इस मामले में सवाल पूछने या निर्देश देने के लिए अपनी न्यायिक शक्ति का इस्तेमाल कर सकती है?
आपने दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की घोषणा और विधानसभा निलंबित रखने के खिलाफ अपील की है। क्या आप उस निर्णय से सहमत हैं? क्या कोर्ट को यह अधिकार है कि वह विधानसभा भंग करने का आदेश दे सके? इन सब पर अदालत गुरुवार को भी सभी पक्षों की दलीलें सुनेगी।