फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   on atali is now politics

किसी को परवाह नहीं, दो बार की हिंसा ने वीरान कर दिया है गांव

Fri, 24 Jul 2015 11:38 PM IST
मुकेश शर्मा/अमर उजाला, फरीदाबाद
मुकेश शर्मा/अमर उजाला, फरीदाबाद Updated Fri, 24 Jul 2015 11:38 PM IST
विज्ञापन
on atali is now politics

हर सांप्रदायिक दंगे के बाद एक बात उभरकर सामने आती है कि विपक्ष की नजर में छोटी सी प्रशासनिक चूक भी सरकार की बड़ी विफलता बन जाती है और सरकार के पास दंगे में किसी विपक्षी दल का हाथ होने का सबूत होता है। हालांकि,अटाली दंगे में सत्ता पक्ष विपक्ष की भूमिका तय नहीं कर पाया है। जबकि विपक्ष सरकार पर प्रशासनिक अक्षमता का सवाल जरूर उठा चुका है। दंगों पर सियासत गर्म है, आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। लेकिन, तनावग्रस्त अटाली को उबारने के लिए पक्ष-विपक्ष में बेचैनी नहीं है।

विज्ञापन


अटाली में दो बार हुए सांप्रदायिक तनाव ने गांव को वीरान सा कर दिया। दोनों समुदाय के कई लोग बेघर हो गए और पूरे इलाके का सदियों पुराना सामाजिक ताना-बाना बिखर गया। इस दंगे ने न सिर्फ अटाली के काम-धंधों को राख में बदल दिया। इससे आसपास के गांवों की डेमोग्राफी (जाति विशेष की सामाजिक स्थिति) बदल रही है। इस घटना से दुखी अन्य गांवों में रह रहे संप्रदाय विशेष के लोग गांव छोड़ रहे हैं।
विज्ञापन


त्रासदी यह है कि दंगे के शोले अभी बुझे भी नहीं थे कि एक विपक्षी नेता खुले तौर पर भविष्य के चुनाव को लेकर वोटों के ध्रुवीकरण कर नफे-नुकसान का हिसाब करता नजर आया। जबकि सत्ता पक्ष ने एक बार मामले को शांत कर मौन अवस्था में चला गया। सत्ताधारी नेताओं ने मदद और सुरक्षा के बड़े-बड़े वायदे किए। लेकिन, जमीनी सच्चाई पर पीड़ितों की मदद के लिए फिलहाल कुछ खास नहीं हो रहा।
विज्ञापन
विज्ञापन


दो जुलाई से सैकड़ों परिवार झुग्गियों और रिश्तेदारियों में शरण लिए हुए हैं। लेकिन सत्ता पक्ष ने एक बार भी इन पीड़ितों की सुध नहीं ली। 20 दिन से गांव पुलिसिया पहरे से दुखी हो रहा है। इस दु:ख की पक्ष-विपक्ष को चिंता नहीं है। दो माह से दंगों का दंश झेल रहा शाहीद का परिवार इन दिनों अज्जी कॉलोनी में है।

22 वर्षीय शाहिद कहता है कि दंगों के बाद प्रभावित लोगों को मदद पहुंचाने का वक्त है। उनके जख्मों पर मरहम लगाने का वक्त है। लेकिन नेताओं का ध्यान बेसहारा हुए लोगों को मदद देने की बजाय कहीं और है। शाबिर अली का परिवार दोबारा गांव जाना चाहता है।


शाबिर कहता है कि गांव उनका भी है। लेकिन, कुछ सियासतदानों ने गांव की गंगा-जमुना तहजीब में आग लगा दी। तनाव को खत्म करने के लिए प्रयास तेज करने चाहिए। जो नहीं हो रहे हैं। अधिवक्ता और अटाली निवासी हरेंद्र सौरोत कहते हैं कि इस समय सियासी तूफान पैदा करने की जरूरत नहीं है। बल्कि सांस्कृतिक सोच को बदलने और विचारों व राजनीति के शुद्धिकरण की जरूरत है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed