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Noida News: तीन माह बाद भी एसआईटी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं, कंट्रोल रूम कर्मियों पर हुई कार्रवाई
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(युवराज मेहता मौत मामला)
-जनवरी में ठंडे पानी में पौने दो घंटे तक जिंदगी की जंग लड़ता रहा था इंजीनियर
-मौके पर मौजूद 80 कर्मियों पर नहीं हुई ठोस कार्रवाई, पिता ने जताई नाराजगी
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। सेक्टर-150 स्थित एक निर्माणाधीन प्लॉट में भरे पानी में कार समेत डूबकर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत का मामला करीब तीन महीने बाद भी सवालों के घेरे में है। एसआईटी की जांच रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है। जिससे परिजनों और स्थानीय लोगों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। इस बीच शासन स्तर पर कार्रवाई करते हुए घटना की रात पुलिस कंट्रोल रूम में तैनात तीन कर्मियों को दोषी मानते हुए निलंबित कर विभागीय जांच शुरू कर दी गई है। इनमें असिस्टेंट रेडियो ऑफिसर (एआरओ) ऐशपाल सिंह और रिजर्व सब इंस्पेक्टर (आरएसआई) देवेंद्र शर्मा समेत तीन कर्मचारी शामिल हैं। हालांकि सूत्रों का कहना है कि जिला स्तरीय अधिकारियों द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट में भी इन्हीं नामों को आरोपी बनाया गया था।
बता दे कि 17 जनवरी की रात हुई इस घटना ने पूरे देश में सुर्खियां बटोरी थीं। युवराज मेहता अपनी कार समेत पानी से भरे गड्ढे में फंस गए थे। वह करीब 70 फीट की दूरी से लगातार मदद की गुहार लगाते रहे। जबकि मौके पर पुलिस और दमकल विभाग के करीब 80 कर्मी मौजूद थे। इसके बावजूद उन्हें बचाने के लिए रस्सी, ट्यूब या अन्य आवश्यक संसाधनों का उपयोग नहीं किया गया। करीब पौने दो घंटे तक जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करने के बाद युवराज ने दम तोड़ दिया था। इस दौरान उनके पिता राजकुमार मेहता भी मौके पर मौजूद थे और अपने बेटे को बचाने के लिए बेबस होकर सब कुछ होते देख रहे थे।
रेस्क्यू ऑपरेशन में भी दिखी सुस्ती : घटना के बाद युवराज को बाहर निकालने के लिए करीब साढ़े चार घंटे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चला था। लेकिन इस दौरान भी किसी बड़े अधिकारी की मौके पर मौजूदगी नहीं रही थी। प्राधिकरण, जिला प्रशासन, पुलिस, दमकल और एनडीआरएफ जैसे महत्वपूर्ण विभागों के वरिष्ठ अधिकारी घटनास्थल पर नहीं पहुंचे थे। जिससे प्रशासनिक लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े हुए थे। सेक्टर-150 स्थित टाटा यूरेका पार्क के निवासियों का कहना है कि जिस खतरनाक मोड़ पर यह हादसा हुआ, वहां पहले से ही सुरक्षा इंतजाम न होने की शिकायतें कई बार संबंधित अधिकारियों से की गई थीं।
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एसआईटी जांच पर भी उठे सवाल : घटना के बाद इस मामले में मुख्यमंत्री के निर्देश पर गठित तीन सदस्यीय एसआईटी से लोगों को निष्पक्ष और व्यापक जांच की उम्मीद थी। लेकिन अब तक रिपोर्ट सार्वजनिक न होने और केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई होने से जांच की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं। सूत्रों के मुताबिक एसआईटी ने उन्हीं तीन कर्मियों को दोषी ठहराया है, जिनके नाम जिला अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में दिए थे।
परिजनों में निराशा:
युवराज के पिता राजकुमार मेहता, जो इस समय अपनी बेटी के पास लंदन में हैं। उन्होंने मामले में गहरी निराशा जताई है। उनका कहना है कि अब तक रिपोर्ट सार्वजनिक न होना बेहद चिंताजनक है और इससे यह आशंका बढ़ती जा रही है कि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होगी।
पहले ही हो चुकी है कार्रवाई : जिले के एक अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि जिन कर्मियों को एसआईटी की जांच रिपोर्ट में जिम्मेदार ठहराया गया है। उन्हें उनके खिलाफ घटना के तुरंत बाद ही कार्रवाई की गई थी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह कार्रवाई केवल औपचारिकता तक सीमित है।
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-जनवरी में ठंडे पानी में पौने दो घंटे तक जिंदगी की जंग लड़ता रहा था इंजीनियर
-मौके पर मौजूद 80 कर्मियों पर नहीं हुई ठोस कार्रवाई, पिता ने जताई नाराजगी
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। सेक्टर-150 स्थित एक निर्माणाधीन प्लॉट में भरे पानी में कार समेत डूबकर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत का मामला करीब तीन महीने बाद भी सवालों के घेरे में है। एसआईटी की जांच रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है। जिससे परिजनों और स्थानीय लोगों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। इस बीच शासन स्तर पर कार्रवाई करते हुए घटना की रात पुलिस कंट्रोल रूम में तैनात तीन कर्मियों को दोषी मानते हुए निलंबित कर विभागीय जांच शुरू कर दी गई है। इनमें असिस्टेंट रेडियो ऑफिसर (एआरओ) ऐशपाल सिंह और रिजर्व सब इंस्पेक्टर (आरएसआई) देवेंद्र शर्मा समेत तीन कर्मचारी शामिल हैं। हालांकि सूत्रों का कहना है कि जिला स्तरीय अधिकारियों द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट में भी इन्हीं नामों को आरोपी बनाया गया था।
बता दे कि 17 जनवरी की रात हुई इस घटना ने पूरे देश में सुर्खियां बटोरी थीं। युवराज मेहता अपनी कार समेत पानी से भरे गड्ढे में फंस गए थे। वह करीब 70 फीट की दूरी से लगातार मदद की गुहार लगाते रहे। जबकि मौके पर पुलिस और दमकल विभाग के करीब 80 कर्मी मौजूद थे। इसके बावजूद उन्हें बचाने के लिए रस्सी, ट्यूब या अन्य आवश्यक संसाधनों का उपयोग नहीं किया गया। करीब पौने दो घंटे तक जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करने के बाद युवराज ने दम तोड़ दिया था। इस दौरान उनके पिता राजकुमार मेहता भी मौके पर मौजूद थे और अपने बेटे को बचाने के लिए बेबस होकर सब कुछ होते देख रहे थे।
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रेस्क्यू ऑपरेशन में भी दिखी सुस्ती : घटना के बाद युवराज को बाहर निकालने के लिए करीब साढ़े चार घंटे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चला था। लेकिन इस दौरान भी किसी बड़े अधिकारी की मौके पर मौजूदगी नहीं रही थी। प्राधिकरण, जिला प्रशासन, पुलिस, दमकल और एनडीआरएफ जैसे महत्वपूर्ण विभागों के वरिष्ठ अधिकारी घटनास्थल पर नहीं पहुंचे थे। जिससे प्रशासनिक लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े हुए थे। सेक्टर-150 स्थित टाटा यूरेका पार्क के निवासियों का कहना है कि जिस खतरनाक मोड़ पर यह हादसा हुआ, वहां पहले से ही सुरक्षा इंतजाम न होने की शिकायतें कई बार संबंधित अधिकारियों से की गई थीं।
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एसआईटी जांच पर भी उठे सवाल : घटना के बाद इस मामले में मुख्यमंत्री के निर्देश पर गठित तीन सदस्यीय एसआईटी से लोगों को निष्पक्ष और व्यापक जांच की उम्मीद थी। लेकिन अब तक रिपोर्ट सार्वजनिक न होने और केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई होने से जांच की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं। सूत्रों के मुताबिक एसआईटी ने उन्हीं तीन कर्मियों को दोषी ठहराया है, जिनके नाम जिला अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में दिए थे।
परिजनों में निराशा:
युवराज के पिता राजकुमार मेहता, जो इस समय अपनी बेटी के पास लंदन में हैं। उन्होंने मामले में गहरी निराशा जताई है। उनका कहना है कि अब तक रिपोर्ट सार्वजनिक न होना बेहद चिंताजनक है और इससे यह आशंका बढ़ती जा रही है कि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होगी।
पहले ही हो चुकी है कार्रवाई : जिले के एक अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि जिन कर्मियों को एसआईटी की जांच रिपोर्ट में जिम्मेदार ठहराया गया है। उन्हें उनके खिलाफ घटना के तुरंत बाद ही कार्रवाई की गई थी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह कार्रवाई केवल औपचारिकता तक सीमित है।