{"_id":"6ade146f410bae62b808ff8d","slug":"dfgfd-grnoida-news-c-23-1-lko1064-110150-2026-10-25","type":"story","status":"publish","title_hn":"Noida News: 13 साल 10 माह बाद हत्या के मामले में गार्ड और गनमैन बरी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Noida News: 13 साल 10 माह बाद हत्या के मामले में गार्ड और गनमैन बरी
विज्ञापन
(नोटः खबर को ऑनलान नहीं चलाएं)
(अदालत से)
-अदालत में शिकायतकर्ता समेत सभी तथ्य के गवाह मुकरे
-कोर्ट ने कहा, विवेचना में गंभीर खामियां, विवेचक के खिलाफ कार्रवाई का आधार
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। सेक्टर-137 नोएडा में एक युवक की गोली मारकर हत्या के मामले में अदालत ने आरोपी गार्ड अतर सिंह निवासी एटा और गनमैन महेश पचौरी निवासी कासगंज को दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने माना कि अभियोजन आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर सका। घटना की एफआईआर से फैसले तक 13 साल 10 माह लगे।
अभियोजन के अनुसार 24 दिसंबर 2012 को तड़के करीब 4 बजे सुल्तानपुर निवासी बृजेश पाण्डेय (23) शौच के लिए आहूजा कंपनी के सामने खाली पड़ी जगह पर गया था। आरोप था कि कंपनी के गार्ड अतर सिंह ने उन्हें टोका और गाली-गलौज की। फिर उसने गनमैन महेश पचौरी को आवाज देकर गोली मारने को कहा। इस पर महेश ने बंदूक से फायर कर दिया, जिससे बृजेश की मौके पर मौत हो गई। उसी दिन सुबह साथी अमित कुमार मिश्रा की तहरीर पर थाना सूरजपुर में दोनों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ था।
अभियोजन ने 10 गवाह पेश किए, लेकिन तथ्य का कोई गवाह घटना की पुष्टि नहीं कर सका। कोर्ट ने कहा कि घटना का समर्थन किसी भी तथ्य के गवाह ने नहीं किया। शेष गवाह औपचारिक थे, जिनके बयान से आरोपियों का घटना में शामिल होना साबित नहीं होता।
विज्ञापन
विवेचक के खिलाफ कार्रवाई का आदेश : अदालत ने विवेचक पीयूष दीक्षित को लेकर कहा कि शिकायतकर्ता चश्मदीद नहीं था। उसने यह भी माना कि आरोपियों के आहूजा कंपनी में गार्ड या गनमैन होने का कोई दस्तावेजी साक्ष्य नहीं जुटाया गया। विवेचक ने कोर्ट में कहा कि बंदूक फॉरेंसिक लैब नहीं भेजी गई और वह कोर्ट में मौजूद भी नहीं है। जबकि फाइल पर एफएसएल जांच रिपोर्ट मौजूद थी। ऐसा प्रतीत होता है कि विवेचक ने जानबूझकर आरोपियों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से घोर लापरवाही की। अदालत ने लिखा कि विवेचक के खिलाफ कार्यवाही का आधार बनता है। कोर्ट ने फैसले की एक प्रति जिलाधिकारी को भेजने का आदेश दिया है।
कोर्ट ने पाया कि महेश की बंदूक लाइसेंसी थी और यह दोनों पक्षों को स्वीकार था। इसलिए धारा 25 का अपराध नहीं बनता। लाइसेंस शर्तों के उल्लंघन का आरोप हत्या साबित होने पर टिका था, जो साबित नहीं हुआ। कोर्ट ने यह भी कहा कि अतर सिंह के पास से कोई हथियार बरामद नहीं हुआ था। कोर्ट ने दोनों को संदेह का लाभ देते हुए दोनों मुकदमों में दोषमुक्त किया।
विज्ञापन
(अदालत से)
-अदालत में शिकायतकर्ता समेत सभी तथ्य के गवाह मुकरे
-कोर्ट ने कहा, विवेचना में गंभीर खामियां, विवेचक के खिलाफ कार्रवाई का आधार
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। सेक्टर-137 नोएडा में एक युवक की गोली मारकर हत्या के मामले में अदालत ने आरोपी गार्ड अतर सिंह निवासी एटा और गनमैन महेश पचौरी निवासी कासगंज को दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने माना कि अभियोजन आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर सका। घटना की एफआईआर से फैसले तक 13 साल 10 माह लगे।
अभियोजन के अनुसार 24 दिसंबर 2012 को तड़के करीब 4 बजे सुल्तानपुर निवासी बृजेश पाण्डेय (23) शौच के लिए आहूजा कंपनी के सामने खाली पड़ी जगह पर गया था। आरोप था कि कंपनी के गार्ड अतर सिंह ने उन्हें टोका और गाली-गलौज की। फिर उसने गनमैन महेश पचौरी को आवाज देकर गोली मारने को कहा। इस पर महेश ने बंदूक से फायर कर दिया, जिससे बृजेश की मौके पर मौत हो गई। उसी दिन सुबह साथी अमित कुमार मिश्रा की तहरीर पर थाना सूरजपुर में दोनों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ था।
विज्ञापन
अभियोजन ने 10 गवाह पेश किए, लेकिन तथ्य का कोई गवाह घटना की पुष्टि नहीं कर सका। कोर्ट ने कहा कि घटना का समर्थन किसी भी तथ्य के गवाह ने नहीं किया। शेष गवाह औपचारिक थे, जिनके बयान से आरोपियों का घटना में शामिल होना साबित नहीं होता।
विज्ञापन
विवेचक के खिलाफ कार्रवाई का आदेश : अदालत ने विवेचक पीयूष दीक्षित को लेकर कहा कि शिकायतकर्ता चश्मदीद नहीं था। उसने यह भी माना कि आरोपियों के आहूजा कंपनी में गार्ड या गनमैन होने का कोई दस्तावेजी साक्ष्य नहीं जुटाया गया। विवेचक ने कोर्ट में कहा कि बंदूक फॉरेंसिक लैब नहीं भेजी गई और वह कोर्ट में मौजूद भी नहीं है। जबकि फाइल पर एफएसएल जांच रिपोर्ट मौजूद थी। ऐसा प्रतीत होता है कि विवेचक ने जानबूझकर आरोपियों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से घोर लापरवाही की। अदालत ने लिखा कि विवेचक के खिलाफ कार्यवाही का आधार बनता है। कोर्ट ने फैसले की एक प्रति जिलाधिकारी को भेजने का आदेश दिया है।
कोर्ट ने पाया कि महेश की बंदूक लाइसेंसी थी और यह दोनों पक्षों को स्वीकार था। इसलिए धारा 25 का अपराध नहीं बनता। लाइसेंस शर्तों के उल्लंघन का आरोप हत्या साबित होने पर टिका था, जो साबित नहीं हुआ। कोर्ट ने यह भी कहा कि अतर सिंह के पास से कोई हथियार बरामद नहीं हुआ था। कोर्ट ने दोनों को संदेह का लाभ देते हुए दोनों मुकदमों में दोषमुक्त किया।