7 मई पर विशेष:भट्टा पारसौल कांड के बाद समय बदला, सरकारें बदली मगर नहीं बदले किसानों के हालात
- कई किसानों ने सब कुछ गंवाया
- जहां से चले थे वहीं पर हैं किसान आज भी
- आंदोलन में किसानों पर लगे मुकद्में, अभी भी हैं मुर्कर
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विस्तार
पांच साल पहले सात मई 2011 को भट्टा-पारसौल गांव में जमीन अधिग्रहण के विरोध में पुलिस और किसानों के बीच हिंसक संघर्ष में दो किसान और दो पुलिसकर्मियों की जान गई।
तत्कालीन डीएम दीपक अग्रवाल के पैर में गोली तक लगी थी और किसानों पर मुकद्में भी दर्ज हुए। ग्रामीणों का खूब उत्पीडन हुआ मगर जिस अधिकार के लिए लड़ाई लड़ी थी वह आज भी जस की तस है।
किसानों को जमीन का उचित मुआवजा तक नहीं मिला है और न्याय पाने के लिए मजबूरी में किसान अदालत की शरण में गए हैं। इस दौरान दो सरकारें बदली और ग्रामीणों ने अपना चैन-सुख और नींद तक गवां दी मगर हालात आज भी ऐसे ही हैं।
किसान दर्ज मुकदमों को वापस कराने के लिए आज भी नेताओं के चक्कर काट रहे हैं। साल 2009 में किसानों की जमीन को धारा-चार और छह तथा नौ की कार्रवाई करके प्राधिकरण ने अधिग्रहण कर लिया।
किसानों की जमीन पर आबादी है या नहीं इसका भी ध्यान नहीं रखा गया और वातानुकूलित आफिसों में बैठकर ही सेटेलाइट सर्वे कर लिया गया। जब किसानों को पता चला कि उनकी आबादियों तक को अधिग्रहीत कर लिया है तो वह गुस्सा गए और 17 जनवरी 2011 से आंदोलन की नींव पड़ी।
इसके बाद तो आंदोलन उग्र होता चला गया। किसान नेता मनवीर तेवतिया के नेतृत्व में भट्टा गांव में किसान आंदोलन कर रहे थे और यह आंदोलन हिंसक रूप ले गया।
सात मई 2011 को पुलिस और किसान आमने-सामने भिड़ गए और जमकर गोलियां चलीं। खूनी संघर्ष में किसान राजपाल, राजवीर और पुलिस कर्मी मनोज और मनोहर की गोली लगने से मौत हो गई। वहीं तत्कालीन जिलाधिकारी दीपक अग्रवाल के पैर में गोली लगी थी।
डीएम समेत साठ से अधिक लोग घायल हुए थे। मामले में पुलिस, प्रशासन और रेलवे ने किसानों पर 12 मुकद्में दर्ज किए गए। जिनमें से सात मुकदमों को प्रदेश सरकार ने वापस कर लिया। पांच मुकदमें चल रहे है। उनको वापस नहीं लिया जा सका है।
नहीं बढ़ी मुआवजा की दरें
किसानों के द्वारा जमीन अधिग्रहण के दौरान बाजार दरों पर मुआवजा, 50 फीसदी जमीन का भूखंड वापस देने, किसान परिवार के युवकों को नौकरी देने समेत मांगे की जा रही थी।
आंदोलन के चलते किसानों के द्वारा की जा रही मांगों को इतनी बडी घटना होने के बाद भी गंभीरता से नहीं लिया गया। किसानों की मांगों पर कोई विचार नहीं हुआ। किसानों की मांगे ज्यो की त्यो है।
इतना जरूर है किसानों पर दर्ज हुए मुकदमें और गांव में हुए पुलिस के पिटाई और घरों के सामान को तोडने के चलते अब वे आंदोलन करने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे है।
मुख्यमंत्री से नौकरी की आस
भट्टा निवासी मोंटी और कपिल के सिर से पिता राजपाल का साया उठ गया। राजनेताओं ने घटना के दिन से लेकर कई माह तक नौकरी दिलाने का आश्वासन दिया मगर आज तक दोनों बेटे नौकरी के लिए नेताओं के चक्कर काट रहे हैं।
पिछले सप्ताह मुख्यमंत्री से मिलने के लिए लखनऊ गए थे मगर ट्रेन का हादसा होने के कारण वह समय से नहीं पहुंच पाए थे। अब तो मुख्यमंत्री से ही आस है कि वह नौकरी दे दें।