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Loksabha Elections : जिसने जीती दिल्ली ...उसे मिली देश की कमान, 2014 का चुनाव रहा अपवाद; दोध्रुवीय रहा मुकाबला

Mon, 11 Mar 2024 05:18 AM IST
दुष्यंत शर्मा संतोष कुमार, नई दिल्ली
संतोष कुमार, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Mon, 11 Mar 2024 05:18 AM IST
सार

पहले संसदीय चुनाव से अभी तक इस मामले में सिर्फ दो अपवाद रहे हैं। वहीं, अभी तक कोई पार्टी सातों सीटें तभी जीत सकी है, जब उसे 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिले। इसमें सिर्फ 2014 का चुनाव अपवाद साबित हुआ है।

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Loksabha Elections: Whoever won Delhi got the command of the country
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विस्तार

संसदीय चुनावों के इतिहास में जिस राजनीतिक दल ने दिल्ली की चार या उससे ज्यादा लोकसभा सीटें जीतीं, उसे ही देश की बागडोर संभालने का मौका मिला है। पहले संसदीय चुनाव से अभी तक इस मामले में सिर्फ दो अपवाद रहे हैं। वहीं, अभी तक कोई पार्टी सातों सीटें तभी जीत सकी है, जब उसे 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिले। इसमें सिर्फ 2014 का चुनाव अपवाद साबित हुआ है।

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दरअसल, 17 संसदीय चुनावों के विश्लेषण से दिल्ली की दिलचस्प सियासी तस्वीर उभरती है। इसमें वर्ष 1967 व 1991 के अलावा दूसरे सभी चुनावों का एक ही ट्रेंड रहा है। इनके अलावा सभी चुनावों में दिल्ली के बहुमत ने केंद्र की सत्ता दिलवाई है। वर्ष 1996 से 2019 तक तो सभी सात आम चुनावों का लगातार यही ट्रेंड रहा। वर्ष 1967 के चुनाव में सात में से छह सीटें मिलने के बावजूद जन संघ की जगह केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी थी। ऐसे ही 1991 में भाजपा को सात में से पांच सीटें तो मिलीं, लेकिन सरकार कांग्रेस ने बनाई। राजनीतिक विश्लेषक प्रो. चंद्रचूड सिंह का कहना है कि इस ट्रेंड से दिल्ली को बेलवेदर राज्य कहा जा सकता है।
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दूसरी तरफ दिल्ली में पहली बार सात सीटें 1967 में बनीं। तब से लेकर 2019 तक चुनावों में सात बार किसी एक पार्टी ने सातों सीटें जीतीं। इसमें तीन-तीन बार कांग्रेस व भाजपा और एक बार भारतीय लोक दल ने दिल्ली की सातों पर क्लीन स्वीप किया है। सिर्फ 2014 को छोड़कर जब भी किसी दल ने सातों सीट जीतीं तो वोट प्रतिशत 50 फीसदी से ऊपर रहा है। 2014 के चुनाव में भाजपा को 46.4 फीसदी वोट ही मिले थे।
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भाजपा के बाद की दिल्ली
1980 में भाजपा की स्थापना के बाद 1984 से 2019 तक के दस लोकसभा चुनावों में भाजपा को 42 फीसदी और कांग्रेस को 44 फीसदी मत हासिल किए। वहीं, दस चुनावों की 70 सीटों में कांग्रेस 26 और भाजपा 43 पर जीती है। इस बीच दिल्ली में हुए सभी लोकसभा चुनाव द्विध्रुवीय ही रहे हैं। इसमें 1989 व 1991 में जनता दल को 16.3 व 14.2 फीसदी मत मिले। 1989 के चुनाव में जनता दल को बाहरी दिल्ली की एक लोक सभा सीट भी जीती, लेकिन मत प्रतिशत के हिसाब से टक्कर मुख्यतया भाजपा व कांग्रेस में रही।

2019 में कांग्रेस रही सबसे कमजोर, भाजपा का प्रदर्शन सुधरा
1952 के बाद से दिल्ली में कांग्रेस का सबसे कमजोर प्रदर्शन 2019 में रहा। इसमें कांग्रेस सिर्फ 22.6 फीसदी वोट ही हासिल कर सकी थी। इससे पहले अपने सबसे बुरे हालात में भी कांग्रेस 30 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे। इसमें आपातकाल के बाद हुए 1977 के चुनाव में पार्टी को 30.2 फीसदी व 2014 में 33 फीसदी वोट मिले। विशेषज्ञ बताते हैं कि अपनी इसी कमजोरी की वजह से कांग्रेस नेतृत्व दिल्ली में आप से समझौता करने को राजी हुआ। दूसरी तरफ भाजपा की पूर्ववर्ती जनसंघ ने दिल्ली में पहला चुनाव लड़ा और सिर्फ 3.7 फीसदी वोट मिले। इसके बाद लगातार प्रदर्शन में सुधार हुआ। सबसे ज्यादा वोट भाजपा को 2019 में मिले। भाजपा का मत प्रतिशत 56.9 फीसदी तक पहुंच गया। 

पहले से अब तक के चुनाव में बदलाव
तकनीक से बेशक आज चुनावी प्रक्रिया आसान हो गई है, लेकिन पहले यह बेहद जटिल थी। आजादी के बाद पहले आम चुनाव में पूरी प्रक्रिया चुनौती भरी थी। जिनको वोट करना था, उनकी साक्षरता बेहद कम थी। करीब 15 फीसदी मतदाता ही शिक्षित थे। वहीं, इन तक पहुंचने के साधन सीमित थे। मतदाताओं तक अपनी बात ले जाना राजनीतिक दल के लिए भी मुश्किल था और निर्वाचन आयोग के लिए भी। इस सबके साथ सब-कुछ नया और पहली बार हो रहा था। 1952 के चुनाव ने इतने बड़े और बुनियादी अंदेशों को झूठा करार दिया। दिल्ली के 57.09 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर मिसाल कायम की।

दिल्ली में हमेशा से संसदीय चुनाव दो दलों में लड़ा गया। इस बार का चुनाव भी अपवाद नहीं है। इसमें एक तरफ कांग्रेस व आप का गठबंधन और दूसरी तरफ भाजपा होगी। इसमें कांग्रेस सबसे कमजोर वर्ष 2019 में हुई और भाजपा सबसे मजबूत। इसके पीछे की बड़ी वजह मोदी फैक्टर है। इसके अलावा क्लीन स्वीप करने वाले दल को हर बार 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिले हैं। यही तस्वीर इस बार भी दिखने की उम्मीद है। 
- प्रो. चंद्रचूड़ सिंह, डीयू प्रोफेसर और राजनीतिक विशेषज्ञ

20 गुना बढ़े मतदाता
चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि पहले चुनाव में दिल्ली में 7,44,668 मतदाता थे। इसमें से करीब चार लाख लोगों ने अपने प्रतिनिधियों को चुना। पहले आम चुनाव से लेकर अब तक दिल्ली में मतदाताओं की संख्या 16 गुना बढ़ गई है। जनवरी 2014 की चुनाव आयोग की लिस्ट में 1,47,18,119 वोटर हैं। इस बीच सीटों की संख्या तीन से बढ़कर सात हुई है।


चुनाव प्रचार भी बेहद मुश्किल
आज जिस तरह सोशल मीडिया से लेकर दूसरे प्रचार माध्यमों के जरिये घर-घर तक पहुंचना संभव हो सका है, वह पहले आम चुनाव में कतई संभव नहीं था। उस वक्त तो झंडा, बिल्ला व बैनर भी नहीं मिल पाते थे। जानकार बताते हैं कि समर्थक जिस पार्टी के होते थे, उसका झंडा बनाने के लिए तब लोग अपना गमछा व धोती तक रंग लेते थे। सबके पास साइकिल भी नहीं होती थी। लोग पैदल ही गांव-गांव टहलते रहते थे। नेता ज्यादातर नुक्कड़ सभाएं लगाते थे। इसमें भी तीस चालीस लोग ही शिरकत करते थे।

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