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सवा दो सौ साल पुरानी है शाही जामा मस्जिद
ब्यूरो/अमर उजाला, गाजियाबाद
Updated Tue, 14 Jun 2016 01:03 AM IST
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मस्जिद
- फोटो : अमर उजाला
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इंट्रो- मस्जिदें मुसलमानों की इबादतगाह हैं। खुदा को याद करने के लिए इन इबादतगाहों में पांच वक्त की नमाज से अल्लाह के बंदों की मुरादें पूरी होती हैं, सवाब मिलता है। इबादत से दिल - दिमाग रोशन होता है और गुनाह माफ होते हैं। इन दिनों रमजान का पाक महीना चल रहा है। इस महीने में अमर उजाला आपको रूबरू कराएगा गाजियाबाद की सबसे पुरानी मस्जिदों के इतिहास से, जहां सैकड़ों सालों से अकीदतमंद अल्लाह की इबादत करते आ रहे हैं। शुरुआत कर रहे हैं शहर की पहली शाही जामा मस्जिद से, जिसकी तामीर करीब सवा दो सौ साल पहले हुई थी।
शाही जामा मस्जिद के निर्माण के बारे में सही-सही तारीख तो अब किसी को याद नहीं है, मगर जानकार बताते हैं कि यह 1781 के आसपास बनाई गई थी। उस वक्त तक यहां के मशहूर चार गेट डासना गेट, सिहानी गेट, दिल्ली गेट, जवाहर गेट भी नहीं बने थे।
नवाब गाजीउद्दीन द्वारा बनवाई गई इस मस्जिद के आसपास तब मुसलिम आबादी महज सौ-सवा सौ के करीब थी।
शाही जामा मस्जिद सिहानी गेट मार्केट के पास सोहनलाल मोहल्ले में है। पहले ईद की नमाज भी इसी मस्जिद में होती थी। ईद और जुमे की नमाज अदा करने के लिए शहर के अलावा देहात से भी लोग आते थे।
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मस्जिद की जमीन करीब 300 गज है, लेकिन पहले यह महज 50 गज में बनी हुई थी। इसके बाद इसमें बरामदा बनवाया गया और एक गैलरी बनवाई गई। अब मस्जिद करीब ढाई सौ गज में है।
मस्जिद के इमाम नूर मोहम्मद 45 सालों से यहां इमामत कर रहे हैं। वह हापुड़ के रहने वाले हैं। नूर मोहम्मद बताते हैं कि मस्जिद में गुबंद बनी होने के कारण मौसम का ज्यादा असर नहीं होता है।
सर्दियों में ज्यादा सर्दी और गर्मियों में ज्यादा गर्मी नहीं लगती है। हालांकि यहां मुस्लिम आबादी ज्यादा नहीं है, लेकिन आसपास के मोहल्लों के लोगों और दुकानदारों से पांचों नमाजों में मस्जिद गुलजार रहती है।
जुमे केदिन तो 500 से ज्यादा लोग यहां नमाज अदा करते हैं। काफी तादाद में लोग पैसे से मस्जिद की इमदाद करते हैं, जिससे मस्जिद में जरूरी काम कराए जाते हैं। फिलहाल मस्जिद में पुताई का काम चल रहा है।
नायब शहर काजी हकीम के जेड़ बुखारी का कहना है कि आज शहर में काफी तादाद में मस्जिदें हैं, मगर जामा मस्जिद यही है। बता दें कि गाजियाबाद को 1740 में नवाब गाजीउद्दीन ने बसाया था। उन्होंने इसे गाजीउद्दीनगर नाम दिया था। बाद में इसका नाम गाजियाबाद हो गया था।
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शाही जामा मस्जिद के निर्माण के बारे में सही-सही तारीख तो अब किसी को याद नहीं है, मगर जानकार बताते हैं कि यह 1781 के आसपास बनाई गई थी। उस वक्त तक यहां के मशहूर चार गेट डासना गेट, सिहानी गेट, दिल्ली गेट, जवाहर गेट भी नहीं बने थे।
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नवाब गाजीउद्दीन द्वारा बनवाई गई इस मस्जिद के आसपास तब मुसलिम आबादी महज सौ-सवा सौ के करीब थी।
शाही जामा मस्जिद सिहानी गेट मार्केट के पास सोहनलाल मोहल्ले में है। पहले ईद की नमाज भी इसी मस्जिद में होती थी। ईद और जुमे की नमाज अदा करने के लिए शहर के अलावा देहात से भी लोग आते थे।
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मस्जिद की जमीन करीब 300 गज है, लेकिन पहले यह महज 50 गज में बनी हुई थी। इसके बाद इसमें बरामदा बनवाया गया और एक गैलरी बनवाई गई। अब मस्जिद करीब ढाई सौ गज में है।
मस्जिद के इमाम नूर मोहम्मद 45 सालों से यहां इमामत कर रहे हैं। वह हापुड़ के रहने वाले हैं। नूर मोहम्मद बताते हैं कि मस्जिद में गुबंद बनी होने के कारण मौसम का ज्यादा असर नहीं होता है।
सर्दियों में ज्यादा सर्दी और गर्मियों में ज्यादा गर्मी नहीं लगती है। हालांकि यहां मुस्लिम आबादी ज्यादा नहीं है, लेकिन आसपास के मोहल्लों के लोगों और दुकानदारों से पांचों नमाजों में मस्जिद गुलजार रहती है।
जुमे केदिन तो 500 से ज्यादा लोग यहां नमाज अदा करते हैं। काफी तादाद में लोग पैसे से मस्जिद की इमदाद करते हैं, जिससे मस्जिद में जरूरी काम कराए जाते हैं। फिलहाल मस्जिद में पुताई का काम चल रहा है।
नायब शहर काजी हकीम के जेड़ बुखारी का कहना है कि आज शहर में काफी तादाद में मस्जिदें हैं, मगर जामा मस्जिद यही है। बता दें कि गाजियाबाद को 1740 में नवाब गाजीउद्दीन ने बसाया था। उन्होंने इसे गाजीउद्दीनगर नाम दिया था। बाद में इसका नाम गाजियाबाद हो गया था।