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सॉफ्टवेयर इंजीनियर से मोती उत्पादक बने जितेंद्र: 100 गज में खड़ा किया कारोबार, सालाना 30 लाख तक मुनाफा

Sun, 11 Oct 2026 03:31 PM IST
Rahul Kumar Tiwari अमर उजाला नेटवर्क, गाजियाबाद
अमर उजाला नेटवर्क, गाजियाबाद Published by: Rahul Kumar Tiwari Updated Sun, 11 Oct 2026 03:31 PM IST
सार

गाजियाबाद के जितेंद्र चौधरी ने सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी छोड़कर मोती उत्पादन को कारोबार बनाया। महज 100 वर्ग गज में जापानी तकनीक से मोती उगाकर वह सालाना 25 से 30 लाख रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं। 100 से अधिक किसानों को प्रशिक्षण भी दे चुके हैं।
 

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Software engineer Jitendra quit his job to become pearl producer earning annual profit of up to rs30 lakh
इंजीनियर ने सीपियों में उगाई कामयाबी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गाजियाबाद में कंप्यूटर पर कोडिंग करने वाले हाथों ने जब सीपियों में मोती उगाने का हुनर सीखा तो कॅरिअर की एक नई इबारत लिख दी। मुरादनगर के खुर्रमपुर निवासी जितेंद्र चौधरी कभी सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे। अच्छी कमाई वाली नौकरी छोड़कर उन्होंने ऐसा रास्ता चुना, जिसके बारे में बहुत कम लोग सोचते हैं।

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एक छोटे से टब में मोती उत्पादन की शुरुआत की और धीरे-धीरे इसे कारोबार में बदल दिया। आज उनके उगाए मोती मुंबई, दिल्ली, कोलकाता समेत देश के विभिन्न बाजारों के साथ ही हांगकांग, कतर, बहरीन और ऑस्ट्रेलिया तक पहुंच रहे हैं। खास बात यह है कि अपनी इस कामयाबी को उन्होंने खुद तक सीमित नहीं रखा। वह अब तक 100 से अधिक किसानों को मोती उत्पादन का प्रशिक्षण भी दे चुके हैं, ताकि दूसरे लोग भी इस अनूठी खेती से अपनी आमदनी बढ़ाने का रास्ता तलाश सकें।

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जीतेंद्र बताते हैं कि उन्होंने गाजियाबाद के दुहाई स्थित आईएमआर कॉलेज से वर्ष 2007 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद कई देशी-विदेशी कंपनियों में नौकरी की। कनाडा की एक कंपनी में नौकरी के दौरान उन्हें जापान जाने का मौका मिला, जहां उन्होंने मोतियों की खेती देखी। यहीं से उनके मन में कुछ अलग करने का विचार आया।

शुरुआत में इंटरनेट से इसके बारे में सीखा और वर्ष 2009 में घर पर ही प्रयोग के तौर पर प्लास्टिक के टबों में यह काम शुरू किया। धीरे-धीरे मेहनत रंग लाई तो वर्ष 2015 में नौकरी छोड़कर इसी काम में रम गए। इस क्षेत्र के बारे में पढ़ना और शोध करना शुरू किया। सीखने की ललक उन्हें जापान तक ले गई, जहां उन्होंने मोती उत्पादन का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद इंडोनेशिया और थाईलैंड में भी प्रशिक्षण प्राप्त किया। ऑस्ट्रेलिया व फ्रांस के विशेषज्ञों से ऑनलाइन प्रशिक्षण लेकर अपनी तकनीकी समझ को और बेहतर बनाया। पत्नी व परिवार के अन्य सदस्य भी इस काम में उनका हाथ बंटाते हैं।
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जापानी तकनीक से कर रहे उत्पादन
जितेंद्र जापानी तकनीक से मोती उत्पादन करते हैं। उनके मुताबिक, इससे एक सीप में चार से छह मोती तक तैयार किए जा सकते हैं, जबकि भारतीय तकनीक में एक मोती ही होता है। इसके लिए सीप की सर्जरी कर विशेष प्रक्रिया के तहत उसमें न्यूक्लियस डाला जाता है। इसके बाद अनुकूल परिस्थितियों में मोती विकसित होते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में पानी की गुणवत्ता, ऑक्सीजन का स्तर और तकनीकी देखभाल की अहम भूमिका होती है। जितेंद्र बताते हैं कि मोती की खेती में धैर्य सबसे बड़ी पूंजी है। हर चरण पर बारीकी से ध्यान देना पड़ता है। छोटी-सी लापरवाही उत्पादन प्रभावित कर सकती है।
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सालाना 25 से 30 लाख का लाभ
जीतेंद्र के मुताबिक, अभी वह महज 100 वर्ग गज क्षेत्र में मोती उत्पादन कर रहे हैं। इससे सालाना 25 से 30 लाख रुपये तक का मुनाफा हो जाता है। वहीं, सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी में उनकी सालाना कमाई 10 से 12 लाख रुपये थी।

गुणवत्ता के हिसाब से कीमत
जितेंद्र अलग-अलग श्रेणियों के मोती तैयार करते हैं। इनमें इर्रेगुलर, बसरा, बरोक और केशी जैसे मोती शामिल हैं। उन्होंने बताया कि बसरा मोती की कीमत गुणवत्ता के आधार पर सवा लाख से सात लाख रुपये तक हो सकती है। मोतियों की प्रयोगशाला में जांच के बाद उनकी गुणवत्ता और कीमत तय की जाती है।

मोतियों तक सीमित नहीं कारोबार
जितेंद्र ने कारोबार को सिर्फ मोती उत्पादन तक सीमित नहीं रखा है। वह सीपियों के अन्य हिस्सों के उपयोग और उनसे सह उत्पाद तैयार करने की संभावनाओं पर भी काम कर रहे हैं। मोतियों की माला और अन्य आभूषणों के अलावा सीपियों से कैल्शियम जैसे उत्पाद तैयार करने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।
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