{"_id":"633c939c3c167304ca796b01","slug":"ghaziabad-shahibabad-news-gbd245561135","type":"story","status":"publish","title_hn":"प्रख्यात कथाकार शेखर जोशी का निधन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
प्रख्यात कथाकार शेखर जोशी का निधन
सार
कथा लेखन को दायित्वपूर्ण कर्म मानने वाले प्रख्यात वयोवृद्ध कथाकार शेखर जोशी का 90 वर्ष की आयु में मंगलवार को निधन हो गया। अपनी कहानियों में कामगारों, मजदूरों के जीवन संघर्ष और पहाड़ की पीड़ा को बयां करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार ने दोपहर तीन बजकर 20 मिनट पर अंतिम सांस ली। उन्हें 1987 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार, 1995 में साहित्य भूषण और 1997 में पहल सम्मान से सम्मानित किया गया था।नौकरी छोड़ बन गए ‘कोशी के घटवार’शेखर जोशी का जन्म 10 सितम्बर 1932 को अल्मोड़ा जनपद के सोमेश्वर ओलिया गांव में हुआ था।
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
प्रख्यात कथाकार शेखर जोशी का निधन
गाजियाबाद। कथा लेखन को दायित्वपूर्ण कर्म मानने वाले प्रख्यात वयोवृद्ध कथाकार शेखर जोशी का 90 वर्ष की आयु में मंगलवार को निधन हो गया। आंतों में संक्रमण होने पर वह नौ दिन से वैशाली के अस्पताल में भर्ती थे। अपनी कहानियों में कामगारों, मजदूरों के जीवन संघर्ष और पहाड़ की पीड़ा को बयां करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार ने दोपहर तीन बजकर 20 मिनट पर अंतिम सांस ली। उनकी इच्छा के अनुरूप बुधवार को उनका देहदान किया जाएगा।
वह वसुंधरा सेक्टर सात स्थित जनसत्ता अपार्टमेंट में अपने छोटे बेटे व संस्कृतिकर्मी/फिल्मकार संजय जोशी, पुत्रवधू और पोती के साथ रहते थे। संजय जोशी ने बताया कि उनके पार्थिव शरीर को बुधवार को शारदा यूनिवर्सिटी को दे दिया जाएगा।
अस्पताल में रहने के दौरान उन्होंने अपनी आखिरी संग्रह की डमी भी देखी और बेटे संजय को इसमें सुधार के कुछ सुझाव भी दिए। बेटे प्रतुल ने बताया कि उनकी कथा समग्र संग्रह शीघ्र प्रकाशित होगी। इसके बाद फकीरों का शहर नाम से किताब आएगी। आखिरी समय तक वह रचनाधर्म में लगे रहे।
विज्ञापन
उनकी कहानियों का अंग्रेजी, चेक, पोलिश, रुसी और जापानी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उनकी कहानी दाज्यू पर बाल-फिल्म सोसायटी ने फिल्म का निर्माण किया। उनकी प्रमुख रचनाओं में कोशी के घटवार (1958), साथ के लोग (1978), हलवाहा (1981), नौरंगी बीमार है (1990), मेरा पहाड़ (1989), डागरी वाला (1994), बच्चे का सपना (2004) और आदमी का डर (2011) हैं।
चुने गए थे अमर उजाला शब्द सम्मान के लिए
शेखर जोशी को हिंदी कथा लेखन क्षेत्र में विलक्षण योगदान के लिए इसी वर्ष अमर उजाला के सर्वोच्च शब्द सम्मान ‘आकाशदीप’ के लिए चुना गया था। नौ जुलाई 2022 को पुरस्कार की घोषणा के मौके पर उन्होंने कहा था, एक लेखक को यह पता होना चाहिए कि वह क्या लिख रहा है, क्योंकि लेखन सामाजिक जिम्मेदारी से बंधा हुआ कर्म है। उन्हें 1987 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार, 1995 में साहित्य भूषण और 1997 में पहल सम्मान से सम्मानित किया गया था।
नौकरी छोड़ बन गए ‘कोशी के घटवार’
शेखर जोशी का जन्म 10 सितम्बर 1932 को अल्मोड़ा जनपद के सोमेश्वर ओलिया गांव में हुआ था। उन्होंने प्राथमिक स्तर की शिक्षा अजमेर और देहरादून से प्राप्त की। 12वीं की पढ़ाई के दौरान ही उनका चयन ईएमई सुरक्षा विभाग में हो गया। 1986 में उन्होंने नौकरी से स्वैछिक रूप से त्याग पत्र दे दिया। फिर वह लेखन से जुड़ गए। उनको प्रसिद्धि उनकी रचना कोशी के घटवार से मिली। उनकी एक और कहानी दाज्यू पर एक बाल फिल्म भी बनी है।
कहानियों में झलकता है मजदूरों का संघर्ष
फैक्टरियां, कामगार और मध्यम निम्न वर्ग का संघर्ष तथा उनके अंतर्विरोध को शेखर जोशी ने अपने लेखन में खास स्थान दिया। उनकी कथा यात्रा में शुरुआत से लेकर अंत तक श्रमिक जीवन के प्रसंग बार-बार दिखाई देते हैं। उनसे जुड़े आलोचक लेखक रविंद्र त्रिपाठी ने बताया कि शेखर जोशी बताते थे कि उनके जीवन का एक भाग कारखानों में ही बीता था। वहां पर तेल, मिट्टी, कालिख से सने कपड़ों में शानदार किरदार छिपे थे। उन किरदारों ने जिंदगी को एक नया अर्थ दे दिया।
उनके लेखन काल की शुरुआत में ट्रेड यूनियन आंदोलन अपने चरम पर था। कामगारों में श्रम नीतियों के प्रति असंतोष था। इसे उन्होंने बहुत करीब से देखा और महसूस किया। उनकी रचनाओं में कारखानों का जीवन और कामगारों के जीवन का संघर्ष ही केंद्र बिंदु रहा। उन्होंने कारखाना मजदूर के जीवन, कारखानों के अंदरूनी परिवेश, मजदूरों के निम्न मध्यम वर्गीय संघर्ष को अपनी रचना भूमि में जगह दी। उन्होंने अपने स्मरण और शब्द चित्रों में कामगारों के किरदारों को जीवंत किया। उनके लेखन से उनके जीवन, चिंतायों और सरोकारों को जाना व समझा जा सकता है।
विज्ञापन
गाजियाबाद। कथा लेखन को दायित्वपूर्ण कर्म मानने वाले प्रख्यात वयोवृद्ध कथाकार शेखर जोशी का 90 वर्ष की आयु में मंगलवार को निधन हो गया। आंतों में संक्रमण होने पर वह नौ दिन से वैशाली के अस्पताल में भर्ती थे। अपनी कहानियों में कामगारों, मजदूरों के जीवन संघर्ष और पहाड़ की पीड़ा को बयां करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार ने दोपहर तीन बजकर 20 मिनट पर अंतिम सांस ली। उनकी इच्छा के अनुरूप बुधवार को उनका देहदान किया जाएगा।
वह वसुंधरा सेक्टर सात स्थित जनसत्ता अपार्टमेंट में अपने छोटे बेटे व संस्कृतिकर्मी/फिल्मकार संजय जोशी, पुत्रवधू और पोती के साथ रहते थे। संजय जोशी ने बताया कि उनके पार्थिव शरीर को बुधवार को शारदा यूनिवर्सिटी को दे दिया जाएगा।
विज्ञापन
अस्पताल में रहने के दौरान उन्होंने अपनी आखिरी संग्रह की डमी भी देखी और बेटे संजय को इसमें सुधार के कुछ सुझाव भी दिए। बेटे प्रतुल ने बताया कि उनकी कथा समग्र संग्रह शीघ्र प्रकाशित होगी। इसके बाद फकीरों का शहर नाम से किताब आएगी। आखिरी समय तक वह रचनाधर्म में लगे रहे।
विज्ञापन
उनकी कहानियों का अंग्रेजी, चेक, पोलिश, रुसी और जापानी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उनकी कहानी दाज्यू पर बाल-फिल्म सोसायटी ने फिल्म का निर्माण किया। उनकी प्रमुख रचनाओं में कोशी के घटवार (1958), साथ के लोग (1978), हलवाहा (1981), नौरंगी बीमार है (1990), मेरा पहाड़ (1989), डागरी वाला (1994), बच्चे का सपना (2004) और आदमी का डर (2011) हैं।
चुने गए थे अमर उजाला शब्द सम्मान के लिए
शेखर जोशी को हिंदी कथा लेखन क्षेत्र में विलक्षण योगदान के लिए इसी वर्ष अमर उजाला के सर्वोच्च शब्द सम्मान ‘आकाशदीप’ के लिए चुना गया था। नौ जुलाई 2022 को पुरस्कार की घोषणा के मौके पर उन्होंने कहा था, एक लेखक को यह पता होना चाहिए कि वह क्या लिख रहा है, क्योंकि लेखन सामाजिक जिम्मेदारी से बंधा हुआ कर्म है। उन्हें 1987 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार, 1995 में साहित्य भूषण और 1997 में पहल सम्मान से सम्मानित किया गया था।
नौकरी छोड़ बन गए ‘कोशी के घटवार’
शेखर जोशी का जन्म 10 सितम्बर 1932 को अल्मोड़ा जनपद के सोमेश्वर ओलिया गांव में हुआ था। उन्होंने प्राथमिक स्तर की शिक्षा अजमेर और देहरादून से प्राप्त की। 12वीं की पढ़ाई के दौरान ही उनका चयन ईएमई सुरक्षा विभाग में हो गया। 1986 में उन्होंने नौकरी से स्वैछिक रूप से त्याग पत्र दे दिया। फिर वह लेखन से जुड़ गए। उनको प्रसिद्धि उनकी रचना कोशी के घटवार से मिली। उनकी एक और कहानी दाज्यू पर एक बाल फिल्म भी बनी है।
कहानियों में झलकता है मजदूरों का संघर्ष
फैक्टरियां, कामगार और मध्यम निम्न वर्ग का संघर्ष तथा उनके अंतर्विरोध को शेखर जोशी ने अपने लेखन में खास स्थान दिया। उनकी कथा यात्रा में शुरुआत से लेकर अंत तक श्रमिक जीवन के प्रसंग बार-बार दिखाई देते हैं। उनसे जुड़े आलोचक लेखक रविंद्र त्रिपाठी ने बताया कि शेखर जोशी बताते थे कि उनके जीवन का एक भाग कारखानों में ही बीता था। वहां पर तेल, मिट्टी, कालिख से सने कपड़ों में शानदार किरदार छिपे थे। उन किरदारों ने जिंदगी को एक नया अर्थ दे दिया।
उनके लेखन काल की शुरुआत में ट्रेड यूनियन आंदोलन अपने चरम पर था। कामगारों में श्रम नीतियों के प्रति असंतोष था। इसे उन्होंने बहुत करीब से देखा और महसूस किया। उनकी रचनाओं में कारखानों का जीवन और कामगारों के जीवन का संघर्ष ही केंद्र बिंदु रहा। उन्होंने कारखाना मजदूर के जीवन, कारखानों के अंदरूनी परिवेश, मजदूरों के निम्न मध्यम वर्गीय संघर्ष को अपनी रचना भूमि में जगह दी। उन्होंने अपने स्मरण और शब्द चित्रों में कामगारों के किरदारों को जीवंत किया। उनके लेखन से उनके जीवन, चिंतायों और सरोकारों को जाना व समझा जा सकता है।