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30 साल बाद नौ में से एक गवाह पहुंचा कोर्ट वह भी बयान से मुकर गया...बस चालक बरी
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30 साल बाद नौ में से एक गवाह पहुंचा कोर्ट वह भी बयान से मुकर गया...बस चालक बरी
गाजियाबाद। रोडवेज बस की टक्कर से प्रेम बहादुर नाम के युवक की मौत हो जाने के मामले में 30 साल की सुनवाई के बाद कोर्ट में नौ में से सिर्फ एक गवाह सत्यपाल पहुंचा। वह भी अपने बयान से साफ मुकर गया जबकि रिपोर्ट उसने ही दर्ज कराई थी। इसी आधार पर अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) रवि शंकर गुप्ता की कोर्ट ने हादसे में मौत के आरोपी 83 साल के हो चुके सेवानिवृत्त बस चालक राम लखन मिश्रा को बरी कर दिया। इस केस में समन दर समन जारी होने के बावजूद हादसे के चश्मदीद से लेकर पुलिसवाले तक गवाही के लिए नहीं आए।
श्री राम पिस्टन कंपनी के कर्मचारी सत्यपाल की ओर से 14 जनवरी 1993 को सिहानी गेट थाने में दर्ज कराए गए केस में बताया गया था कि लखनऊ के कैसर बाग डिपो की रोडवेज बस की टक्कर से कंपनी में उनके साथी कर्मचारी प्रेम बहादुर की मौत हो गई। हादसा मेरठ रोड पर कंपनी की फैक्टरी के पास उसके सामने हुआ। दो अन्य कर्मचारी जगत बहादुर और किशन बहादुर भी मौजूद थे। बस चालक राम लखन को मौके से पकड़ा गया।
पुलिस ने राम लखन के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। 1992 से ही यह केस चल रहा था। जगत बहादुर और किशन बहादुर समेत नौ गवाहों में से कोई कोर्ट में नहीं पहुंचा। 27 जून को लाल क्वार्टर निवासी सत्यपाल ने गवाही दी।
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बदल गया मृतक का नाम
बचाव पक्ष के अधिवक्ता नरेश यादव ने बताया कि एफआईआर में सत्यपाल ने मृतक का नाम गाजियाबाद निवासी प्रेम पाल बताया जबकि कोर्ट में कहा कि हादसे में मौत गाजीपुर के जनार्दन की हुई थी। इसी तरफ एफआईआर में घटनास्थल मेरठ रोड है जबकि सत्यपाल ने कोर्ट में लोहिया नगर- पटेल नगर रोड बताया। उसने कहा कि पुलिस ने उसका बयान दर्ज नहीं किया था बल्कि दरोगा ने अपनी तरफ से लिख लिया था।
अदालत और ईश्वर पर भरोसा था
इस केस में आरोपी लखनऊ निवासी राम लखन मिश्रा हर तारीख पर कोर्ट में आते रहे। वह 2002 में रोडवेज से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें अदालत और ईश्वर पर भरोसा था। हादसा किसी और वाहन से हुआ था जबकि आरोपी उन्हें बना दिया गया था। इसे साबित करने में 30 साल लग गए। वह तारीख के लिए लखनऊ से एक दिन पहले चलते थे।
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गाजियाबाद। रोडवेज बस की टक्कर से प्रेम बहादुर नाम के युवक की मौत हो जाने के मामले में 30 साल की सुनवाई के बाद कोर्ट में नौ में से सिर्फ एक गवाह सत्यपाल पहुंचा। वह भी अपने बयान से साफ मुकर गया जबकि रिपोर्ट उसने ही दर्ज कराई थी। इसी आधार पर अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) रवि शंकर गुप्ता की कोर्ट ने हादसे में मौत के आरोपी 83 साल के हो चुके सेवानिवृत्त बस चालक राम लखन मिश्रा को बरी कर दिया। इस केस में समन दर समन जारी होने के बावजूद हादसे के चश्मदीद से लेकर पुलिसवाले तक गवाही के लिए नहीं आए।
श्री राम पिस्टन कंपनी के कर्मचारी सत्यपाल की ओर से 14 जनवरी 1993 को सिहानी गेट थाने में दर्ज कराए गए केस में बताया गया था कि लखनऊ के कैसर बाग डिपो की रोडवेज बस की टक्कर से कंपनी में उनके साथी कर्मचारी प्रेम बहादुर की मौत हो गई। हादसा मेरठ रोड पर कंपनी की फैक्टरी के पास उसके सामने हुआ। दो अन्य कर्मचारी जगत बहादुर और किशन बहादुर भी मौजूद थे। बस चालक राम लखन को मौके से पकड़ा गया।
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पुलिस ने राम लखन के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। 1992 से ही यह केस चल रहा था। जगत बहादुर और किशन बहादुर समेत नौ गवाहों में से कोई कोर्ट में नहीं पहुंचा। 27 जून को लाल क्वार्टर निवासी सत्यपाल ने गवाही दी।
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बदल गया मृतक का नाम
बचाव पक्ष के अधिवक्ता नरेश यादव ने बताया कि एफआईआर में सत्यपाल ने मृतक का नाम गाजियाबाद निवासी प्रेम पाल बताया जबकि कोर्ट में कहा कि हादसे में मौत गाजीपुर के जनार्दन की हुई थी। इसी तरफ एफआईआर में घटनास्थल मेरठ रोड है जबकि सत्यपाल ने कोर्ट में लोहिया नगर- पटेल नगर रोड बताया। उसने कहा कि पुलिस ने उसका बयान दर्ज नहीं किया था बल्कि दरोगा ने अपनी तरफ से लिख लिया था।
अदालत और ईश्वर पर भरोसा था
इस केस में आरोपी लखनऊ निवासी राम लखन मिश्रा हर तारीख पर कोर्ट में आते रहे। वह 2002 में रोडवेज से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें अदालत और ईश्वर पर भरोसा था। हादसा किसी और वाहन से हुआ था जबकि आरोपी उन्हें बना दिया गया था। इसे साबित करने में 30 साल लग गए। वह तारीख के लिए लखनऊ से एक दिन पहले चलते थे।