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गंगा-यमुना दोआब: 200 किमी से लंबी प्राचीन नदी धारा, भूजल बढ़ाने पर खर्च होंगे 2.36 करोड़; पायलट परियोजना मंजूर

Sun, 18 Oct 2026 06:21 AM IST
दुष्यंत शर्मा ज्योति सिंह, नई दिल्ली
ज्योति सिंह, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 18 Oct 2026 06:21 AM IST
सार

एनएमसीजी के मुताबिक, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान ने कौशांबी से कानपुर तक भूमिगत प्राचीन नदी धाराओं और भूजल भंडारों का अध्ययन किया।
 

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Ganga-Yamuna Doab: Ancient river course over 200 km long; ₹2.36 crore to be spent on groundwater recharge
file pic - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जमीन के नीचे दबी प्राचीन नदी धाराएं भूजल के भंडारण और पुनर्भरण में मददगार हो सकती हैं। गंगा-यमुना दोआब में ऐसी ही एक प्राचीन नदी धारा यानी पैलियोचैनल की पहचान की गई है, जिसकी कुल लंबाई 200 किलोमीटर से अधिक बताई गई है। इस भूमिगत संरचना की मदद से भूजल पुनर्भरण की संभावनाओं को परखने के लिए 2.36 करोड़ रुपये की पायलट परियोजना को मंजूरी दी गई है। 

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राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में दाखिल जवाब में यह जानकारी दी। मामले की सुनवाई 13 अक्तूबर को एनजीटी की प्रधान पीठ में अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद के समक्ष हुई। अधिकरण ने अध्ययन की अंतिम रिपोर्ट रिकॉर्ड पर ली। अगली सुनवाई 5 फरवरी 2027 को होगी।
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45 किमी की धारा का विस्तार 200 किमी से आगे तक मिला
एनएमसीजी के मुताबिक, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान ने कौशांबी से कानपुर तक भूमिगत प्राचीन नदी धाराओं और भूजल भंडारों का अध्ययन किया।
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इसमें हवाई सर्वेक्षण, भूभौतिकीय जांच और बोरहोल के जरिए सत्यापन किया गया। पहले पहचानी गई 45 किलोमीटर लंबी धारा को कानपुर की दिशा में लगभग 160 किलोमीटर आगे तक खोजा गया। इस तरह इसकी कुल मानचित्रित लंबाई 200 किलोमीटर से अधिक हो गई। अध्ययन में जमीन के नीचे 500 मीटर की गहराई तक तीन प्रमुख भूजल भंडार प्रणालियों की भी पहचान की गई। परियोजना के तहत डिजिटल उपकरणों से भूजल स्तर की निगरानी की जाएगी। भूजल की गुणवत्ता भी जांची जाएगी।

160 संभावित स्थलों में से छह का चयन
रिपोर्ट के अनुसार, भूजल पुनर्भरण के लिए करीब 160 संभावित स्थलों की पहचान की गई। इनमें से छह स्थलों पर सरकारी जमीन की उपलब्धता का मौके पर सत्यापन हुआ है। इन्हीं जगहों पर प्रदर्शनात्मक परियोजना के तहत वैज्ञानिक तरीके से पुनर्भरण संरचनाएं बनाई जाएंगी। परियोजना के लिए 2.36 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं। इसमें 1.65 करोड़ रुपये उत्तर प्रदेश के भूजल विभाग और 70.40 लाख रुपये सीएसआईआर-राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान को आवंटित किए गए हैं। परियोजना 36 महीने में पूरी   की जानी है।

बूढ़ी गंगा के उद्गम और प्रवाह मार्ग की होगी तकनीकी जांच
बूढ़ी गंगा नदी का वास्तविक उद्गम कहां है, उसका ऐतिहासिक प्रवाह मार्ग क्या था और वर्तमान में उसकी धारा किन क्षेत्रों से होकर गुजरती है, इसकी पहचान के लिए तकनीकी जांच की जाएगी। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने बताया कि नदी के उद्गम, प्रवाह की निरंतरता और गंगा या उसकी किसी सहायक नदी से संगम का पता लगाने के लिए तकनीकी समूह गठित किया गया है। समूह ऐतिहासिक नक्शों, उपग्रह चित्रों, राजस्व अभिलेखों और तकनीकी रिपोर्टों की जांच करेगा। इसके बाद चिह्नित स्थलों का संयुक्त निरीक्षण किया जाएगा।

एनजीटी की प्रधान पीठ में 16 अक्टूबर को प्रियंक भारती बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले की सुनवाई हुई। सुनवाई में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने बताया कि अधिकरण के तीन अगस्त के आदेश के अनुपालन में आवेदक प्रियंक भारती ने बूढ़ी गंगा के उद्गम और प्रवाह मार्ग से संबंधित ऐतिहासिक नक्शे, भारतीय सर्वेक्षण विभाग के अभिलेख और अन्य दस्तावेज 

प्रस्तुत किए हैं। 

ऐतिहासिक और वर्तमान मार्ग का होगा मिलान
तकनीकी समूह यह पता लगाएगा कि बूढ़ी गंगा का ऐतिहासिक और वर्तमान में पहचाना जा सकने वाला उद्गम बिंदु कहां है तथा उसका पूरा प्रवाह मार्ग क्या रहा है। साथ ही, नदी की धारा में निरंतरता के प्रमाण तलाशे जाएंगे और ऐतिहासिक मार्ग की तुलना मौजूदा जल प्रवाह चैनल से की जाएगी। इससे नदी के गंगा या उसकी किसी सहायक नदी से संगम स्थल की पहचान करने में मदद मिलेगी। मिशन की ओर से दाखिल शपथपत्र के अनुसार, तकनीकी समूह की बैठक 29 सितंबर 2026 को हुई थी। इसमें जांच की कार्यप्रणाली, उपलब्ध दस्तावेजों और राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान से प्राप्त आंकड़ों की समीक्षा की गई। अब चिह्नित स्थलों का संयुक्त निरीक्षण कर आगे का आकलन किया जाएगा।

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