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अटाली दंगे का एक साल : साल भर बाद भी दंगे से उबर नहीं पाया अटाली गांव
मुकेश शर्मा/अमर उजाला, फरीदाबाद
Updated Fri, 27 May 2016 09:32 AM IST
सार
- आधे से ज्यादा समुदाय विशेष के लोग अभी भी बाहर
- कई बार माहौल को शांत करने की जा चुकी है कोशिश
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विस्तार
अटाली में हुए दंगे को पूरा एक साल बीत गया है। इस एक साल में काफी कुछ बदल भी गया है, लेकिन कुछ चीजें अभी नहीं बदली हैं। दंगा पीड़ितों का दर्द से भरा हुआ चेहरा, लोगों की आंखों में आंसू और उजड़ चुकी बस्ती एक साल पहले का भयानक मंजर याद दिलाने पर मजबूर कर देता है।
आज अटाली दंगे की बरसी है। पिछले साल 25 मई को अटाली गांव में हुए सांप्रदायिक दंगे ने सालों पुराने भाईचारे को एक झटके में ही खत्म कर दिया। बार-बार पंचायत होने के बावजूद विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा।
स्थानीय विधायक, प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री तक इस विवाद को शांत कराने की कोशिश कर चुके हैं। लेकिन कुछ असामाजिक तत्वों के कारण विवाद आज भी ज्यों का त्यों है। 19 मई को तेवतिया पाल द्वारा बुलाई गई दोनों समुदाय की पंचायत का फैसला भी सिरे चढ़ता दिखाई नहीं दे रहा है। दबी आवाज में दोनों समुदाय के लोग फैसले का विरोध कर रहे हैं।
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फैसले नहीं चढ़ते सिरे
करीब एक साल से गांव से पलायन कर सेक्टर दो, अज्जी कॉलोनी, फतेहपुर तगा, खंदावली, हथीन और बड़खल गांव में रह रहे दर्जनों परिवारों के आंखों के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। अनूप शाह, रज्जू ने बताया कि दंगाइयों ने घरों में आग लगा दी। जान से मारने को हथियार भी चलाए।
अब गांव के लोग गलती भी नहीं मानते। आज भी हमें धमकी मिलती है। धार्मिक स्थल को लेकर गांव में 100 से ज्यादा पंचायत हुई। प्रशासन के साथ शांति कमेटी, तेवतिया पाल, कालीरमन खाप कई बार कवायद कर चुकी है। लेकिन, पंचायत में हुआ फैसला आज तक सिरे नहीं चढ़ा। जिससे तनाव शांत हो सके।
नहीं माना गया सीएम का फैसला
दोनों समुदाय के बीच तनाव को कम करने के लिए गठित शांति कमेटी की पंचायत में फार्मूला निकला कि वक्फ बोर्ड की धार्मिक स्थल के लिए गांव से बाहर जमीन खरीदेगा और धार्मिक स्थल का निर्माण होगा। फार्मूले को लेकर दोनों समुदाय के करीब 150 लोग मुख्यमंत्री मनोहर लाल से भी मिले। जहां दोनों समुदाय ने गले मिलकर विवाद को खत्म करने की घोषणा की। इसके बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ। गांव के किसी व्यक्ति ने धार्मिक स्थल के लिए जमीन नहीं दी।
राजनीति के चक्रव्यूह में फंसा गांव
एक साल से फैसला न होने के लिए ग्रामीण सबसे ज्यादा राजनीति को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। राजनीति के चक्रव्यूह में फंसे गांव में अब लोग एक-दूसरे पर विश्वास नहीं करते। ग्रामीणों का कहना है कि जिन लोगों ने पहले खेल बिगाड़ा था, वो अब हिमायती बनकर मामले को सुलझाना चाहते हैं।
क्या है विवाद
गांव में एक धार्मिक स्थल के निर्माण को लेकर दोनों समुदायों में काफी समय से विवाद चल रहा था। 25 मई को वहां पर आगजनी की गई और लूटपाट हुई। दोनों पक्षों में जमकर पत्थरबाजी हुई। जिला प्रशासन ने पूरे गांव को छावनी में तब्दील कर दिया।
एक समुदाय के लोग डर के कारण बल्लभगढ़ थाने में बनाए गए शिविर में शरण लेने को मजबूर हो गए। मामला शांत नहीं हुआ कि दोबारा 1 जुलाई को विवादित स्थल पर दोनों पक्षों की ओर से पत्थरबाजी हुई।
सके बाद संप्रदाय विशेष के लोग गांव से पलायन कर गए। पुलिस ने दर्ज अलग-अलग मामलों में 90 से ज्यादा लोगों को आरोपी बनाया। जबकि 18 लोगों के खिलाफ गैर जमानती वारंट है। इनमें वर्तमान सरपंच प्रह्लाद खुद आरोपी हैं। वहीं तीन लोग नीमका जेल में है। इस विवाद को सुलझाने के लिए कई बार प्रयास किए गए। लेकिन सभी विफल साबित हुए।
हमारी जानकारी के मुताबिक ग्राम पंचायत की जमीन पर कोई भी धार्मिक स्थल नहीं बन सकता। पंचायत ने यह झूठा वादा किया है। फैसला जबरदस्ती किया गया था। बहुसंख्यक समुदाय अल्पसंख्यकों को जबरदस्ती दबाना चाहता है। -हाजी शाकिर, पीड़ित पक्ष
ग्राम पंचायत पूरी तरह आशावादी है। हम हिम्मत नहीं हारेंगे। पंचायत एक्ट में प्रावधान है कि पंचायत विभागीय निदेशक की अनुमति के बाद जमीन बेच सकती है। दोनों पक्षों को धैर्य रखने की जरूरत है। मसले का हल जल्द ही निकलेगा।
-प्रह्लाद सिंह, सरपंच गांव अटाली
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आज अटाली दंगे की बरसी है। पिछले साल 25 मई को अटाली गांव में हुए सांप्रदायिक दंगे ने सालों पुराने भाईचारे को एक झटके में ही खत्म कर दिया। बार-बार पंचायत होने के बावजूद विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा।
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स्थानीय विधायक, प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री तक इस विवाद को शांत कराने की कोशिश कर चुके हैं। लेकिन कुछ असामाजिक तत्वों के कारण विवाद आज भी ज्यों का त्यों है। 19 मई को तेवतिया पाल द्वारा बुलाई गई दोनों समुदाय की पंचायत का फैसला भी सिरे चढ़ता दिखाई नहीं दे रहा है। दबी आवाज में दोनों समुदाय के लोग फैसले का विरोध कर रहे हैं।
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फैसले नहीं चढ़ते सिरे
करीब एक साल से गांव से पलायन कर सेक्टर दो, अज्जी कॉलोनी, फतेहपुर तगा, खंदावली, हथीन और बड़खल गांव में रह रहे दर्जनों परिवारों के आंखों के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। अनूप शाह, रज्जू ने बताया कि दंगाइयों ने घरों में आग लगा दी। जान से मारने को हथियार भी चलाए।
अब गांव के लोग गलती भी नहीं मानते। आज भी हमें धमकी मिलती है। धार्मिक स्थल को लेकर गांव में 100 से ज्यादा पंचायत हुई। प्रशासन के साथ शांति कमेटी, तेवतिया पाल, कालीरमन खाप कई बार कवायद कर चुकी है। लेकिन, पंचायत में हुआ फैसला आज तक सिरे नहीं चढ़ा। जिससे तनाव शांत हो सके।
नहीं माना गया सीएम का फैसला
दोनों समुदाय के बीच तनाव को कम करने के लिए गठित शांति कमेटी की पंचायत में फार्मूला निकला कि वक्फ बोर्ड की धार्मिक स्थल के लिए गांव से बाहर जमीन खरीदेगा और धार्मिक स्थल का निर्माण होगा। फार्मूले को लेकर दोनों समुदाय के करीब 150 लोग मुख्यमंत्री मनोहर लाल से भी मिले। जहां दोनों समुदाय ने गले मिलकर विवाद को खत्म करने की घोषणा की। इसके बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ। गांव के किसी व्यक्ति ने धार्मिक स्थल के लिए जमीन नहीं दी।
राजनीति के चक्रव्यूह में फंसा गांव
एक साल से फैसला न होने के लिए ग्रामीण सबसे ज्यादा राजनीति को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। राजनीति के चक्रव्यूह में फंसे गांव में अब लोग एक-दूसरे पर विश्वास नहीं करते। ग्रामीणों का कहना है कि जिन लोगों ने पहले खेल बिगाड़ा था, वो अब हिमायती बनकर मामले को सुलझाना चाहते हैं।
क्या है विवाद
गांव में एक धार्मिक स्थल के निर्माण को लेकर दोनों समुदायों में काफी समय से विवाद चल रहा था। 25 मई को वहां पर आगजनी की गई और लूटपाट हुई। दोनों पक्षों में जमकर पत्थरबाजी हुई। जिला प्रशासन ने पूरे गांव को छावनी में तब्दील कर दिया।
एक समुदाय के लोग डर के कारण बल्लभगढ़ थाने में बनाए गए शिविर में शरण लेने को मजबूर हो गए। मामला शांत नहीं हुआ कि दोबारा 1 जुलाई को विवादित स्थल पर दोनों पक्षों की ओर से पत्थरबाजी हुई।
सके बाद संप्रदाय विशेष के लोग गांव से पलायन कर गए। पुलिस ने दर्ज अलग-अलग मामलों में 90 से ज्यादा लोगों को आरोपी बनाया। जबकि 18 लोगों के खिलाफ गैर जमानती वारंट है। इनमें वर्तमान सरपंच प्रह्लाद खुद आरोपी हैं। वहीं तीन लोग नीमका जेल में है। इस विवाद को सुलझाने के लिए कई बार प्रयास किए गए। लेकिन सभी विफल साबित हुए।
हमारी जानकारी के मुताबिक ग्राम पंचायत की जमीन पर कोई भी धार्मिक स्थल नहीं बन सकता। पंचायत ने यह झूठा वादा किया है। फैसला जबरदस्ती किया गया था। बहुसंख्यक समुदाय अल्पसंख्यकों को जबरदस्ती दबाना चाहता है। -हाजी शाकिर, पीड़ित पक्ष
ग्राम पंचायत पूरी तरह आशावादी है। हम हिम्मत नहीं हारेंगे। पंचायत एक्ट में प्रावधान है कि पंचायत विभागीय निदेशक की अनुमति के बाद जमीन बेच सकती है। दोनों पक्षों को धैर्य रखने की जरूरत है। मसले का हल जल्द ही निकलेगा।
-प्रह्लाद सिंह, सरपंच गांव अटाली