प्लास्टिक कचरे से भी बनेगी बिजली, आईपीसीए की पहल पर हो रहा काम
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विभिन्न उत्पादों के बाहर और भीतर चिपकाई जाने वाली पतली प्लास्टिक थैली और कवर को न ही कोई कूड़ा-कचरा बीनने वाली एजेंसी उठाती है और न ही इनका कभी रिसाइकल और निस्तारण होता है। बेहद हल्के इन प्लास्टिक का बाजार में भी कोई भाव नहीं। इन्हें मल्टी लेयर प्लास्टिक (एमएलपी) कहते हैं। पहली बार इन्हें एकत्र कर सीमेंट प्लांट और पूर्वी दिल्ली नगर निगम के वेस्ट टू एनर्जी प्लांट तक पहुंचाने का काम शुरू हुआ है। इंडियन पॉल्यूशन कंट्रोल एसोसिएशन (आईपीसीए) ने पायलट योजना के तहत बीते सात महीनों में 900 टन एमएलपी कचरा बटोरा है। साथ ही इस बेभाव कचरे से बिजली भी बनाई है।
आईपीसीए के निदेशक आशीष जैन ने बताया कि हर रोज दो से तीन टन एमएलपी कचरे की छंटाई और संग्रहण का काम किया जा रहा है। देश के अलग-अलग हिस्सों से कूड़ा कचरा बीनने वाली एजेंसियों की मदद से बीते सात महीनों में अब तक 900 टन एमएलपी इकट्ठा किया गया है। इन्हें एसीसी और अंबुजा सीमेंट व गाजीपुर लैंडफिल साइट पर मौजूद वेस्ट टू एनर्जी प्लांट को बिजली बनाने के लिए भेजा जा चुका है।
आशीष जैन ने बताया कि एमएलपी का रिसाइकल कभी नहीं होता। ज्यादातर रोजमर्रा के सामान से बड़ी मात्रा में एमएलपी कचरा पैदा होता है। यह नदी-नालों में तो जा ही रहा है। इन्हें कोई उठाता और खरीदता भी नहीं क्योंकि इनका कोई मूल्य नहीं है। ऐसी प्लास्टिक प्रदूषण और गंदगी की बड़ी वजह हैं। पान गुटखा कंपनियों के पैकेट हों या फिर नमकीन-बिस्कुट के पैकेट सभी एमएलपी हैं। आईपीसीए के मुताबिक, हर रोज 2 से 3 टन कचरा इकट्ठा होता है।
बीते वर्ष नवंबर में इसकी शुरुआत की गई थी। वी केयर नाम से इस पायलट योजना में पेप्सिको इंडिया होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड, नेस्ले इंडिया लिमिटेड, परफेटी वैन मेले इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, डाबर इंडिया लिमिटेड और धर्मपाल-सत्यपाल लिमिटेड के साथ पूर्वी दिल्ली नगर निगम के साथ सहयोग का करार किया गया है।