महिला की गिरफ्तारी पर रोक को मिली चुनौती, इस धारा को खारिज करने की हुई मांग
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बैंकों से ऋण लेने के बाद भुगतान नहीं करने पर महिला की गिरफ्तारी पर रोक के संबंध में प्रावधान को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई है। याचिका पर सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 56 को खारिज करने की मांग की गई है।
याचिका में कहा गया है कि धन के भुगतान के लिए डिक्री जारी होने के बावजूद इस धारा में महिला को हिरासत में लेने से छूट है और यह सरासर भारतीय संविधान में समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
अदालत ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार, कानून और न्याय मंत्रालय व विधि आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और न्यायमूर्ति सी.हरि शंकर की खंडपीठ ने सभी पक्षों को स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि क्यों न याचिका स्वीकार कर ली जाए।
अदालत ने मामले की सुनवाई 6 फरवरी तय की है। यह याचिका गैर बैंकिंग वित्त कंपनी में काम कर रहे अनिल कुमार ने दायर की है। उन्होंने कहा कि धारा-56 भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 समानता, और 15 धर्म, जाति, जाति, जन्म स्थान व लिंग भेद के आधार पर भेदभाव करती है।
याचिका में यह बातें कही गईं
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता कमलेश कुमार ने खंडपीठ को बताया कि धारा 56 में असमान और अनुचित संरक्षण गलत तरीके से प्रदान किया गया है। उन्होंन कहा यद्यपि एक महिला गलत है और वह डिफॉल्टर होने के बावजूद वह इस प्रावधान का दुरुपयोग कर रही है।
याचिका में कहा गया है कि इतने सारे बैंक और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) लोगों को सुविधाएं और व्यक्तिगत ऋण प्रदान करती हैं क्योंकि इन बैंकों और एनबीएफसी को भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (जी) के तहत संरक्षित किया गया है।
वहीं अब यह फैशन बन गया है कि लोग सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 56 का फायदा उठाकर जानबूझकर धोखाधड़ी करना और बैंक व एनबीएफसी को वाहनों, संपत्ति, व्यक्तिगत ऋण को लेकर नुकसान पहुंचाते है।
उन्होंने कहा महिलाएं निजी क्षमता में ऋण ले रही हैं और धन की वसूली के लिए बैंकों और एनबीएफसी को डिफाल्टरों के खिलाफ सिविल कार्यवाही करने में बहुत पैसा खर्च करना पड़ता है।