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दिल्ली के इस मदरसे में होती है हाइटेक तरीके से पढ़ाई

Sat, 23 Aug 2014 02:45 PM IST
Updated Sat, 23 Aug 2014 02:45 PM IST
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Delhi madrasa goes high-tech, uses apps and gadgets.

एक दीवार है जिसका पेंट जगह-जगह से उखड़ा हुआ है और उसपर एक टैबलेट लगा है। जैसे ही उस टैबलेट में से अक्षरों की आवाज आनी शुरू होती है बच्चों का एक ग्रुप उसके साथ-साथ गाने लगता है।

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यही काम एक दूसरे कमरे में भी हो रहा है पर वहां टैबलेट की जगह लैपटॉप ने ले ली है। बरामदे को पार कर एक कमरा है जिसमें किशोरों का एक ग्रुप क्लास के मॉनीटर चुने जाने की प्रक्रिया में भाग ले रहा है और इन पर निगरानी रखने के लिए एक रिटर्निंग अधिकारी भी है।
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अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार ये सारा नजारा बाबुल उलूम पब्लिक स्कूल का है जो पूर्वी दिल्ली के सीलमपुर इलाके में है, जिसे शहर का काफी गरीब क्षेत्र माना जाता है।
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इस स्कूल की इमारत ही इस इलाके की तस्वीर बयां करने को काफी है। दीवारों पर पड़ी दरारें, टूटे हुए दरवाजे फटी हुई दरी जिसपर बच्चे बैठते हैं और टूटे फर्नीचर।

पर ये सब इस स्कूल की सच्चाई नहीं है बल्कि यहां पलने वाले विचार इन सबसे कई नए और आधुनिक हैं। सारी अव्यवस्थाएं मिलकर भी यहां पैदा होते विचारों के राह का रोड़ा नहीं बन पातीं।

ऐसे शुरू हुआ गरीबों का हाईटेक स्कूल

Delhi madrasa goes high-tech, uses apps and gadgets.

ये 2012 की बात है जब कुछ वॉलेंटियर इस स्कूल में आए जो पिछले लगभग एक दशक से यहां है और यहां के आसपास के 600 लड़कों को भाषा आदि का ज्ञान देने का काम करता था।

तब सीलमपुर इलाके में रहने वाले हजारों परिवारों के बच्चों के लिए यहां न कोई सरकारी और न ही निजी स्कूल था। यहां रहने वाले वाले लोग इतने गरीबी में जीते हैं कि बच्चों को पढ़ाना उनकी प्राथमिकता में बहुत नीचे होता है बल्कि कहें तो नहीं होता है।

इस क्षेत्र के ऐसे बच्चों को देखते हुए वॉलेंटियरों ने पढ़ने के इच्छुक, मदरसा और जनता मजदूर कॉलोनी के लगभग 150 बच्चों को प्रारंभिक अंग्रेजी और गणित पढ़ाना शुरू किया।

इन बच्चों में ल‌ड़कियां भी शामिल थीं और ये सब लगभग तीन घंटे रोजाना पढ़ते थे। वॉलेंटियरों ने मदरसे से सटी हुई एक इमारत में इवनिंग स्कूल भी चलाना शुरू किया।

वॉलेंटियरों का ये प्रयास एक साल तक जारी रहा, जिसके बाद बाबुल उलूम पब्लिक स्कूल अस्तित्व में आया जिसकी नींव सह-शिक्षा और सद्भावना के सिद्धांतों पर रखी गई थी।

अनोखी पढ़ाई के कारण मदद को आई STIR एजुकेशन

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पेशे से बैंकर साजिद हसन ने अपने करियर के शुरूआती दौर में ही मदरसा शिक्षा के विकास के लिए अपनी नौकरी छोड़ने वाले साजिद ने कहा क‌ि सीलमपुर एक गरीब मुस्लिम बहुल इलाका है, जहां अधिकतर परिवार कपड़ों के उद्योग में लगे हैं।

चूंकि वो कभी स्कूल नहीं गए हैं इसलिए बच्चों में भी पढ़ने की प्रवृत्ति कम है और यही वो कारण है जिसने हमें पढ़ाने के तरीके में बदलाव लाने के लिए प्रेरित किया। ये इसलिए भी जरूरी हो गया क्योंकि इन बच्चों के माता-पिता किताब कॉपी नहीं खरीद सकते।

हसन जो अब स्कूल के प्रिंसिपल हैं उनके लिए अच्छी बात ये रही कि उनके इस अनोखे पढ़ाने के तरीके की वजह से उन्हें हेल्प करने के लिए कुछ संस्थाएं सामने आईं। उनमें से दिल्ली की ही एक संस्था है, एसटीआईआर एजुकेशन जो पूरे देश में उन लोगों को मदद करती है जो छोटी जगह और कम खर्च में स्कूल चलाते हैं।

हसन जो अब स्कूल के प्रिंसिपल हैं उनके लिए अच्छी बात ये रही कि उनके इस अनोखे पढ़ाने के तरीके की वजह से उन्हें हेल्प करने के लिए कुछ संस्थाएं सामने आईं। उनमें से दिल्ली की ही एक संस्था है, एसटीआईआर एजुकेशन जो पूरे देश में उन लोगों को मदद करती है जो छोटी जगह और कम खर्च में स्कूल चलाते हैं।

यहां फ्री में भी पढ़ते हैं गरीब बच्चे

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एसटीआईआर एजुकेशन के सीईओ शरथ जीवन का कहना है कि जब हम बाबुल उलूम स्कूल का दौरा करने गए तो हम पढ़ाने के अनोखे तरीके और साजिद व उनके अध्यापकों से बहुत प्रभावित हुए। शरथ ने आगे कहा क‌ि लगभग डेढ़ साल के अंदर इस स्कूल ने जिस तरह का विकास किया है और बच्चों को स्कूल तक लाने में जिस तरह सफल रहे हैं वो काबिले तारीफ है।

चूंकि बच्चों के माता-पिता के पास संसाधनों की कमी होने से वो किताब-कापियां, पेंसिल आदि नहीं खरीद सकते तो हमने एक अल्फाबेट ऐप को बच्चों के अभिभावकों के मोबाइल फोन में इंस्टॉल करने की सोची जिससे घर पर भी बच्चे पढ़ा हुआ रिवाइज कर सकें।

यहां टीचर खुद अपनी क्लास का वीड‌ियो बनाते हैं ताकि बाद में अपने परफारमेंस को चेक कर सकें और उसमें खुद ही सुधार कर सकें। स्कूल के प्रिंसिपल हसन जो एक टूटी कुर्सी पर बरामदे में बैठते हैं बताया कि, स्कूल को अभी तक कहीं से मान्यता नहीं मिली है और ना ही पैसों का सहयोग मिला है।

हसन के मुताबिक स्कूल में हर आयुवर्ग के लगभग 200 बच्चे आते हैं। स्कूल इन बच्चों से 120 रुपया प्रति माह फीस लेता है ताकि बच्चों के माता पिता उन्हें स्कूल भेजते रहें और अगर कोई बच्चा फीस देने में असमर्थ होता है तो उससे कुछ नहीं लिया जाता। हसन का कहना है कि मदरसे के साथ जुड़कर काम करने से उन्हें काफी फायदा हुआ है और अगले पांच सालों में वो और 7 मदरसा स्कूल खोलने की तैयारी में हैं जो दिल्ली, यूपी और हरियाणा में होंगे।

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