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विशेषज्ञों ने बताई समस्या: झमाझम बारिश के लिए तैयार नहीं दिल्ली, 24 घंटे में सिर्फ इतनी बरसात संभाल सकते नाले

Sun, 30 Jun 2024 02:11 AM IST
Vikas Kumar आशीष सिंह, अमर उजाला, नई दिल्ली
आशीष सिंह, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Vikas Kumar Updated Sun, 30 Jun 2024 02:11 AM IST
सार

दिल्ली में प्रमुख नाले और ड्रेनेज सिस्टम अक्सर कचरे और अवरोधों से भरे हैं। इससे जल निकासी धीमी हो जाती है। जबकि कई नाले और जल निकासी के रास्ते अतिक्रमण की वजह से संकरे या बंद हो गए हैं।

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Delhi is not ready for heavy rain drains can bear 50 mm rain in 24 hours
दिल्ली बारिश में डूब जाती है - फोटो : एएनआई

विस्तार

राजधानी झमाझम बारिश के लिए तैयार नहीं है। कम समय में तेज बारिश दिल्ली की सड़कें व गलियां जलमग्न हो जाती हैं। बीते शुक्रवार को भी दिल्ली इसी दर्द से गुजरी। इसकी वजह राजधानी का जल निकासी का सिस्टम है। आबादी बढ़ने के क्रम में इसकी क्षमता में बढ़ोतरी नहीं की जा सकी है। पीडब्ल्यूडी के मुताबिक, शहर का ड्रेनेज सिस्टम 24 घंटे की अवधि में 50 मिमी बारिश को ही झेल सकता है। इससे अधिक बारिश होने पर जल भराव आम होगा।

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विशेषज्ञ बताते हैं कि 2000 के बाद दिल्ली में तेजी से विकास कार्य हुए हैं। इसमें खाली पड़ी जमीन पर फ्लैटों का निर्माण हुआ। वहीं, हरित क्षेत्र बढ़ाने के नाम पर झाड़ियां ज्यादा लगाई गई, वृक्ष कम। उधर, 2011 में दिल्ली की जनसंख्या 1.38 करोड़ थी, जो अब करीब दो करोड़ है। 2014 में 1731 अनधिकृत कॉलोनियों की संख्या अब करीब दो हजार तक पहुंच गई है। इसकी के मद्देनजर 2018 में आईआईटी-दिल्ली की एक रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि रुकावटों से निपटने के लिए सीवर लाइनों को पंचर करने और सीवेज को तूफानी नालों में बहाने की प्रथा को रोका जाना चाहिए। साथ ही, सीवेज और बाढ़ के पानी की निकासी सिस्टम को अलग करने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

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कंक्रीट बढ़ने से पानी नहीं सोख पा रही जमीन
सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरनमेंट (सीएसई) के एक अध्ययन के मुताबिक 2003 से 2022 तक निर्मित क्षेत्र 31.4 फीसदी से बढ़कर 38.2 फीसदी हो गए हैं। ऐसे में बढ़ते कंक्रीट के जंगल ने संकट और बढ़ाया है। सीएसई के कार्यकारी अधिकारी दीपेंदर कपूर ने बताया कि दिल्ली में बारिश होने के बाद उस पानी को कैसे बचाना है, या उसे नदी तक किस तरह पहुंचना है इसकी कोई व्यवस्था नहीं है। नई दिल्ली को छोड़कर बाकी पूरी दिल्ली के क्षेत्र में कंक्रीट का जंगल बढ़ा है। इससे जमीन में पानी नहीं सोख पा रही है। वह कहते हैं कि पहले नदी का पानी बढ़ने से शहर में आता था, लेकिन अब शहर का पानी ही बाढ़ जैसे हालात पैदा कर रहा है। वह कहते हैं कि सरकार की समझ में ड्रेनेज सिस्टम का मतलब सड़कों पर पानी नहीं ठहरना चाहिए। लेकिन, बारिश का पानी कहां ले जाए या उसकी निकासी का रास्ता क्या हो नहीं पता है। उन्होंने कहा कि बेहतर ड्रेनेज सिस्टम को बनाने के लिए विशेषज्ञों को राय लेनी जरूरी है।

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60 फीसदी से अधिक नाले खत्म, अतिक्रमण की चढ़े भेंट
दिल्ली में प्रमुख नाले और ड्रेनेज सिस्टम अक्सर कचरे और अवरोधों से भरे हैं। इससे जल निकासी धीमी हो जाती है। जबकि कई नाले और जल निकासी के रास्ते अतिक्रमण की वजह से संकरे या बंद हो गए हैं। कलबन नाला, बड़ा हिंदू राव, बरापुला, आरके पुरम, दरियागंज, रानी झांसी रोड, करोल बाग में स्थित दरयाई नाला शहरीकरण और अतिक्रमण के कारण इनका अस्तित्व ही खत्म हो गया है। सीटिजन फ्रंट फॉर वाटर डेमोक्रेसी के संयोजक एस ए नकवी बताते हैं कि यमुना नदी के बाढ़ क्षेत्र पर भी अतिक्रमण किया है। सभी जल निकासी के चैनल एक बॉटलनेक हो गए हैं। इससे बारिश के बाद नाले उफान मारते हैं। शहर की जल निकासी प्रणाली यानी ड्रेनेज सिस्टम को दुरुस्त करने की आवश्यकता पर ध्यान देना जरूरी है।

दिल्ली में छोटे-बड़े 2846 हैं नाले
दिल्ली में छोटे-बड़े करीब 2846 नाले हैं और इनकी लंबाई करीब 3692 किलोमीटर है। इन नालों का एक बड़ा हिस्सा पीडब्ल्यूडी के पास है। दिल्ली को तीन प्रमुख प्राकृतिक जल निकासी बेसिन में विभाजित किया है। यह तीन जल निकासी बेसिन ट्रांस यमुना, बारापूला और नजफगढ़ है। इसके अलावा, कुछ बहुत छोटे जल निकासी बेसिन अरुणा नगर और चंद्रवाल भी हैं, जो सीधे यमुना में गिरते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बरसाती पानी की नालियों पर अतिक्रमण हो हटाना जरूरी है। वहीं, इन नालियों में सीवेज व कोई ठोस अपशिष्ट जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। बरसाती पानी सीवर सिस्टम में नहीं बहाया जाना चाहिए। यही नहीं, नालियों के ऊपर निर्माण को रोकना जरूरी है। नए नालों का डिजाइन अलग से नहीं किया जाना चाहिए।

टूटा प्राकृतिक जल निकासी सिस्टम
विशेषज्ञ बताते हैं कि दिल्ली का जल निकासी का प्राकृतिक सिस्टम अनूठा रहा है। इसमें एक बड़ी नदी यमुना, उसमें मिलने वाली 18 सहायक नदियां और फिर पूरे शहर में इस कोने-से उस कोने तक कोई आठ सौ छोटे-बड़े तालाब। साथ में कुछ हजार से ऊपर बावड़ी और कुएं भी इस सिस्टम में जुड़ जाते थे। इस पूरी व्यवस्था के बाद इस शहर में न तो कभी पानी की कमी होनी चाहिए थी, अकाल पड़ना चाहिए था और न कभी इसे बाढ़ से डूबना चाहिए था। इतिहासकार सोहेल हाशमी कहते हैं कि आज हमने पूरे सिस्टम को तोड़ दिया है। कोई भी नदी शहर के सबसे निचले तल से होकर बहती है। तभी शहर का पानी नदी तक पहुंच पाता है। लेकिन हमने नदी के तल से भी नीचे जाकर टनल, अंडर ग्राउंड मेट्रो समेत दूसरी कई संरचनाएं बनाई हैं। नतीजतन दिल्ली का डूबना तय है।

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