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देश में कोरोना महामारी पर रोक लगाने के लिए सभी को मिलकर काम करना होगा: दिल्ली हाईकोर्ट
Fri, 24 Apr 2020 04:38 PM IST
पूजा त्रिपाठी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: पूजा त्रिपाठी
Updated Fri, 24 Apr 2020 04:38 PM IST
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delhi high court
- फोटो : PTI
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि देश में कोरोना महामारी से निबटने के लिए चल रहे संघर्ष में सभी को एकजुट होकर सहयोग करना होगा।
न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने दिल्ली सरकार को खाने के पैकेट प्राप्त करने, प्रवासी श्रमिकों और दिहाड़ी मजदूरों के राहत शिविरों की स्थिति जैसी सभी समस्याओं पर गौर करने के लिये नोडल अधिकारियों की नियुक्ति करने का सुझाव देते हुये यह टिप्पणी की।
अदालत ने बंधुआ मजदूर उन्मूलन के क्षेत्र में काम करने वाले एक गैर सरकारी संगठन की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। इस याचिका में दावा किया गया है कि इन राहत शिविरों में रहने वाले तमाम श्रमिकों को कई बार भूखा रहना पड़ता है क्योंकि रसोई एक किलोमीटर से भी ज्यादा दूर हैं और सामाजिक दूरी के नियम की वजह से परिवार के सारे सदस्य वहां जा नहीं सकते ।
इस संगठन ने भोजन आपूर्ति में अव्यवस्था का आरोप लगाया और यह दावा किया कि श्रमिकों और दिहाड़ी मजदूरों को तीन बार-नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात्रि का भोजन-खाना बमुश्किल मिलता है।
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दिल्ली सरकार की ओर से अतिरिक्त सालिसीटर जनरल संजय जैन ने अदालत के सुझाव से सहमति व्यक्त की और कहा कि गैर सरकारी संगठन को अधिकारियों के नाम और मोबाइल नंबर उपलब्ध कराये जायेंगे।
जैन के कथन का संज्ञान लेते हुये पीठ ने कहा कि इस मामले में अब और किसी निर्देश की आवश्यकता नहीं है। पीठ ने इसके साथ ही जनहित याचिका का निबटारा कर दिया।
इस याचिका का निबटारा करते हुये अदालत ने टिप्पणी की कि केन्द्र और राज्य सरकारें लॉकडाउन की वजह से प्रभावित प्रवासी कामगारों की आबादी को खाना, सूखा अनाज और दूसरी जरूरी चीजें मुहैया करने के लिये सभी प्रयास कर रही हैं। लेकिन सरकारों के पास उपलब्ध संसाधनों की अपनी सीमायें हैं और ऐसी विषम परिस्थितियों में सभी एजेन्सियों के असाधारण प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए।
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न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने दिल्ली सरकार को खाने के पैकेट प्राप्त करने, प्रवासी श्रमिकों और दिहाड़ी मजदूरों के राहत शिविरों की स्थिति जैसी सभी समस्याओं पर गौर करने के लिये नोडल अधिकारियों की नियुक्ति करने का सुझाव देते हुये यह टिप्पणी की।
अदालत ने बंधुआ मजदूर उन्मूलन के क्षेत्र में काम करने वाले एक गैर सरकारी संगठन की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। इस याचिका में दावा किया गया है कि इन राहत शिविरों में रहने वाले तमाम श्रमिकों को कई बार भूखा रहना पड़ता है क्योंकि रसोई एक किलोमीटर से भी ज्यादा दूर हैं और सामाजिक दूरी के नियम की वजह से परिवार के सारे सदस्य वहां जा नहीं सकते ।
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इस संगठन ने भोजन आपूर्ति में अव्यवस्था का आरोप लगाया और यह दावा किया कि श्रमिकों और दिहाड़ी मजदूरों को तीन बार-नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात्रि का भोजन-खाना बमुश्किल मिलता है।
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दिल्ली सरकार की ओर से अतिरिक्त सालिसीटर जनरल संजय जैन ने अदालत के सुझाव से सहमति व्यक्त की और कहा कि गैर सरकारी संगठन को अधिकारियों के नाम और मोबाइल नंबर उपलब्ध कराये जायेंगे।
जैन के कथन का संज्ञान लेते हुये पीठ ने कहा कि इस मामले में अब और किसी निर्देश की आवश्यकता नहीं है। पीठ ने इसके साथ ही जनहित याचिका का निबटारा कर दिया।
इस याचिका का निबटारा करते हुये अदालत ने टिप्पणी की कि केन्द्र और राज्य सरकारें लॉकडाउन की वजह से प्रभावित प्रवासी कामगारों की आबादी को खाना, सूखा अनाज और दूसरी जरूरी चीजें मुहैया करने के लिये सभी प्रयास कर रही हैं। लेकिन सरकारों के पास उपलब्ध संसाधनों की अपनी सीमायें हैं और ऐसी विषम परिस्थितियों में सभी एजेन्सियों के असाधारण प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए।