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Delhi: कोचिंग सेंटर की तीन मंजिलों की सील खोलने की अनुमति, UPSC के तीन विद्यार्थियों की डूबने से हुई थी मौत

Tue, 01 Apr 2025 04:34 AM IST
विजय पुंडीर अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: विजय पुंडीर Updated Tue, 01 Apr 2025 04:34 AM IST
सार

न्यायाधीश ने 26 मार्च को पारित आदेश में कहा कि अदालत को ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं मिला, जो सीबीआई को अनिश्चितकाल के लिए संपत्ति पर नियंत्रण रखने की अनुमति देता हो, खासकर तब जब वह संबंधित अपराध में शामिल न हो।

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court allowed to open the seal of three floors of the coaching center
अदालत(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राउज एवेन्यू कोर्ट ने जुलाई 2024 में यूपीएससी के तीन छात्रों की डूबने से हुई मौत के मामले में राव आईएएस स्टडी सर्कल की इमारत की तीन मंजिलों की सील खोलने की अनुमति दी है। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश (पीडीएसजे) अंजू बजाज चांदना ने द्वितीय तल के मालिक गुरप्रीत सिंह और भूतल और प्रथम तल के मालिक ऋषि खन्ना की तरफ से दायर याचिकाओं को अनुमति दे दी।

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न्यायाधीश ने 26 मार्च को पारित आदेश में कहा कि अदालत को ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं मिला, जो सीबीआई को अनिश्चितकाल के लिए संपत्ति पर नियंत्रण रखने की अनुमति देता हो, खासकर तब जब वह संबंधित अपराध में शामिल न हो। अदालत ने कहा कि उनके विचार से वादी को उनकी संपत्ति से निपटने की अनुमति दी जानी चाहिए और उन्हें सौंप दी जानी चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश नियमों, विनियमों या उपनियमों के उल्लंघन के मामले में नगर निगम अधिकारियों को संबंधित भवन के खिलाफ कोई कार्रवाई करने से नहीं रोकेगा।
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मृतकों में से एक के पिता के वकील ने आवेदन का विरोध किया और कहा कि भवन का निर्माण भवन स्वीकृति योजना के बिना किया गया था। कोर्ट ने कहा कि उसका मानना है कि किसी भी उल्लंघन के मामले में भवन मालिकों के खिलाफ कार्रवाई करना अधिकारियों का काम है।
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सीबीआई को संपत्ति को सील रखने का कोई अधिकार नहीं है। संबंधित अधिकारी नियमों के अनुसार इमारत के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र हैं। कहा कि परिसर की दूसरी मंजिल अपराध स्थल नहीं है, क्योंकि घटना बेसमेंट में हुई थी।

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निस्वार्थ सेवा के बदले सैनिकों को शेष जीवन में सहारा दे सरकार : हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने दो पूर्व सैनिकों को दिव्यांगता पेंशन का लाभ देने के फैसले को सही ठहराया है। अदालत ने केंद्र सरकार की अपील खारिज कर दी, जिसमें आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल (एएफटी) के निर्णय को चुनौती दी गई थी। न्यायमूर्ति सी हरि शंकर और न्यायमूर्ति अजय दिगपॉल की खंडपीठ ने कहा कि सैनिक के रूप में देश की सेवा करने वाले व्यक्ति के लिए बीमारी और अक्षमता का खतरा स्वाभाविक है।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि सबसे बहादुर सैनिक भी, जो कठिन परिस्थितियों में देश की सेवा करता है, शारीरिक बीमारियों का शिकार हो सकता है, जो उसे सैन्य सेवा जारी रखने में असमर्थ बना दे। ऐसे में सरकार का कर्तव्य है कि उनकी निस्वार्थ सेवा के बदले उन्हें शेष जीवन में आराम और सहारा दे। कोर्ट ने सैनिकों की निस्वार्थ सेवा को याद करते हुए कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति रहेजॉन एफ कैनेडी ने कहा था कि यह मत पूछो कि देश आपके लिए क्या कर सकता है, बल्कि यह पूछो कि आप देश के लिए क्या कर सकते हैं। कुछ लोग इसे सिर्फ प्रशंसा तक सीमित रखते हैं, लेकिन कुछ इसे जीवन का हिस्सा बनाते हैं। जब हम चिमनी के पास गर्म कॉफी पीते हैं, ये सैनिक सीमा पर ठंडी हवा का सामना करते हैं अपनी जान जोखिम में डालकर। क्या हम इन सच्चे देशभक्तों को जो कुछ भी दे सकते हैं, वह कभी ज्यादा हो सकता है।

यह है मामला
दो पूर्व सैनिकों में से एक गवास अनिल मडसो 1985 में सेना में शामिल हुए और 2015 में डायबिटीज मेलिटस टाइप II के निदान के बाद सेवा से मुक्त हुए। रिलीज मेडिकल बोर्ड ने माना कि उन्हें जीवनभर 20% अक्षमता रहेगी, लेकिन दिव्यांगता पेंशन से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने इसे गलत ठहराया। कोर्ट ने माना कि सेवा नियमों के अनुसार सैन्य सेवा के दौरान होने वाली बीमारी को स्वतः उससे जुड़ा नहीं माना जा सकता लेकिन यह बोझ सैनिक पर नहीं, बल्कि सेना पर है कि वह साबित करे कि बीमारी सैन्य सेवा से संबंधित नहीं है। दूसरे पूर्व सैनिक अमीन चंद 2005 में सेना में शामिल हुए और 2020 में रिटायर होने वाले थे, लेकिन रिटायरमेंट से पहले उन्हें दाएं पैर में पेरिफेरल आर्टेरियल ऑक्लूसिव डिजीज का निदान हुआ, जिससे 20% अक्षमता आंकी गई। उन्हें भी पेंशन से वंचित किया गया था।
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