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कोरोना का असर: फैक्टरी चलाएं या नहीं, असमंजस में उद्यमी

Sun, 10 May 2020 10:55 AM IST
विक्रांत चतुर्वेदी अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: विक्रांत चतुर्वेदी Updated Sun, 10 May 2020 10:55 AM IST
सार

  • कहा, इतने नियमों को पूरा करना बेहद मुश्किल, ऊपर से पुलिस का रौब
  • लॉकडाउन में भी वसूला जा रहा है बिजली का फिक्स चार्ज 2 से 5 लाख रुपये

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corona : Whether running a factory or not, entrepreneurs are confused
फैक्टरी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लॉकडाउन-3 में फैक्टरी चलाने की छूट तो मिल गई, लेकिन फैक्टरी खोलने को लेकर असमंजस की स्थिति है। कौन से इलाके में फैक्टरी खुलेगी और कैसे चलेगी? इसे लेकर खासी परेशानी है। उद्यमियों का आरोप है कि पुलिस की सख्ती की वजह से उद्योग चलाना मुश्किल हो गया है। लिहाजा, ताला बंद करके रखना ही उचित है। उनकी यह भी परेशानी है कि लॉकडाउन में फैक्टरी चली नहीं, व्यापार बंद रहा फिर भी बिजली का फिक्स चार्ज वसूला जा रहा है।
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भारतीय उद्योग व्यापार मंडल की तरफ से फैक्टरी चलाने को लेकर जूम एप के माध्यम से मंगलवार को बैठक हुई, जिसमें उद्योग चलाने वालों ने सरकार के नियम-कायदों पर आपत्ति जताई। व्यापार मंडल के महामंत्री हेमंत गुप्ता ने बताया कि पिछले दिनों सरकार की तरफ से यह आदेश आया था कि अधिकृत रूप से चलने वाले उद्योग खोले जाएंगे। 
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इसमें बादली, वजीरपुर, फ्रेंडस कॉलोनी, वजीरपुर, झिलमिल, लॉरेंस रोड, नरेला, बवाना में चलने वाली फैक्टरी शामिल हैं। जब व्यापारी अपनी फैक्टरी की सफाई कर चालू करना चाह रहे थे तो पुलिस-प्रशासन अपने नियम कायदों के तहत चलने नहीं दे रही है। ऐसे में व्यापार चलाना मुश्किल है। फैक्टरी लॉकडाउन में बंद रही, फिर भी बिजली का फिक्स चार्ज 2-5 लाख रुपया देने की मजबूरी है।
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व्यापार मंडल के प्रदेश अध्यक्ष अरुण सिंहानिया ने बताया कि इतनी पाबंदी है कि व्यापार करना मुश्किल है। फैक्टरी चलाने के लिए तो पहले सैनिटाइजेशन कराना है, फिर फैक्टरी में पहुंचने वाले मजदूर व अन्य लोगों की निगरानी करना है कि उसे किसी तरह का संक्रमण तो नहीं, लिफ्ट में पांच व्यक्ति से ज्यादा नहीं आए। ऐसी छोटी-छोटी बातों को पूरा करना मुश्किल है। जरा सी चूक पर फैक्टरी सील होने का खतरा है और फिर पुलिस का रौब सहना।


सरोजनी नगर मिनी मार्केट ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक रंधावा का कहना है कि जमापूंजी तो खत्म है। लॉकडाउन में मजदूर नहीं मिल रहे हैं और रॉ मैटेरियल कैसे लाया जाएगा। डीजल-पेट्रोल की महंगाई के बीच फैक्टरी क्या, छोटी दुकान चलाना भी व्यापारियों के लिए भारी पड़ रहा है। फैक्टरी में माल तैयार भी होता है तो दुकानें खुली नहीं हैं। ऐसे में तैयार माल को कौन खरीदेगा?
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