बाल दिवस पर भी बाल मजदूरी करते रहे बच्चे
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केंद्र सरकार के कम उम्र के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का अधिकार अमल में लाने के बावजूद भी देश का भावी भविष्य कह जाने वाले बच्चें आज भी बाल मजदूरी का ग्रास बनकर दो जून की रोटी तलाशने पर मजबूर है।
हर वर्ष बचपन की यादों को ताजा करने के लिए बाल दिवस का आयोजन किया जाता है। यह बच्चों के लिए उल्लास में डूब जाने का दिन है। स्कूलों में भी यह दिन बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है।
लेकिन इसके बावजूद आज भी हजारों नौ निहाल बाल मजदूरी में फंसे हुए है। कस्बे के ढाबे, होटलों, चाय की दुकानों व अन्य प्रतिष्ठानों पर छोटे छोटे बच्चे खुलेआम मजदूरी करते देखे जा सकते है।
भावी भविष्य कहे जाने वाले बच्चे आज भी बाल मजदूरी का ग्रास बनकर विभिन्न प्रतिष्ठानों पर अपना भविष्य तलासने पर मजबूर है। बाल मजदूरी समाज ही नहीं पूरे देश के लिए अभिशाप है। जिसपर हर हालत में अंकुश लगना चाहिए।
सरकारी नीतियां रही हैं नाकाम
कुछ ऐसा ही हमारी सरकारी नीतियों का हाल है, सरकार बाल मजदूरी को रोकने के लिए योजनाएं तो बनाती है लेकिन यह सभी योजनाएं पेट की भूख के आगे बोनी हो जाती है। ऐसा भी नहीं सरकार बाल मजदूरी को रोकने के लिए गंभीर नहीं है।
सरकार इसे खत्म करने के लिए कानून बनाकर बाल मजूदरी को गैर कानूनी घोषित किया हुआ है। किन्तु भूखे पेट को ज्ञान की नहीं बल्कि सबसे पहले उसे रोटी की जरूरत होती है।
यदि ऐसे बच्चों को शिक्षित करना है तो सरकार द्वारा मुफ्त शिक्षा के साथ साथ ऐसे बच्चों की कमाई से चलने वाले परिवार की गुजर बसर के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।
ताकि बढती बाल मजदूरी पर अंकुश लग सके। बता दे कि पैसा कमाना ऐसे बच्चों का शौक नहीं बल्कि मजबूरी है। अशिक्षा के अभाव में अपने अधिकारों से अनभिज्ञ ये बच्चे एक बंधुआ मजदूर की तरह अपने जीवन को काम में खपा देते हैं और इस तरह देश के नौनिहाल शिक्षा, अधिकार, जागरुकता व सुविधाओं के अभाव में अपने अशिक्षा व अनभिज्ञता के नाम पर अपने सपनों की बलि चढ़ा देता है।