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अमर उजाला शब्द सम्मान 2023 : जो कुछ लिखा अपने अनुभव से लिखा...विनोद कुमार शुक्ल

Wed, 13 Mar 2024 02:42 PM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 13 Mar 2024 02:42 PM IST
सार

मैंने जो अनुभव किया, आस-पास के लोगों, मिलने-जुलने वालों से, जो किताबें मैंने पढ़ी थीं, उन किताबों के अनुभव से मैंने जो पाया और जो अनुभव बनाया, वही मेरा अनुभव रहा है। वही मेरे लेखन में भी है।

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Amar Ujala Shabd Samman 2023: Whatever was written was written from my experience...Vinod Kumar Shukla
समझ और संवेदनाओं का दुर्लभ संयोग हैं विनोद कुमार शुक्ल की कविताएं...

विस्तार

मेरा लिखा हुआ मेरी आत्मकथा ही है। सब कुछ मेरा जाना-पहचाना रहा है। मैंने जो अनुभव किया, आस-पास के लोगों, मिलने-जुलने वालों से, जो किताबें मैंने पढ़ी थीं, उन किताबों के अनुभव से मैंने जो पाया और जो अनुभव बनाया, वही मेरा अनुभव रहा है। वही मेरे लेखन में भी है।

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जब मैं बड़ों के लिए लिखता हूं, तब बिल्कुल नहीं सोचता हूं कि कितने बड़ों के लिए लिख रहा हूं। अपना अनुभव बनाने की उम्र तो कभी भी हासिल हो सकती है। आदमी जब 18, 19 या 20 साल का हुआ तो वह किताबों की समझ को अपने में, चाहे वह किसी के लिए लिख रहा हो, एक पाठक के रूप में अपनी समझ में एक स्थिति तो बना ही लेता है।
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इसके अलावा कोई चारा भी नहीं है। मैं नांदगांव का हूं। घर में एक साहित्यिक वातावरण था, मैं पढ़ता था। पदुमलाल बख्शी भी नांदगांव के ही थे। मेरी मां के बचपन का काफी समय बांग्लादेश के जमालपुर में बीता। वहां क्या स्थिति थी, मुझे ठीक से मालूम नहीं। मेरे नाना का परिवार कानपुर का था। मेरे बाबा भी उत्तर प्रदेश के थे, जो नांदगांव में बसने आ गए थे। मेरी अम्मा के घर में हम बच्चों पर एक अच्छा प्रभाव पड़ा था, खासकर अपने साथ वह बंगाल के साहित्य का संस्कार भी लेकर आ गई थीं। दूसरे भाई-बहन भी लिखने की कोशिश करते थे, पर उनका लिखना बीच में ही छूट गया, लेकिन मैंने लिखना जारी रखा।
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बहुत-सी किताबों के लेखक मेरे प्रिय रचनाकार रहे हैं और मैं बहुत-से बड़े लेखकों के संपर्क में भी रहा। मेरे लिखने के शुरुआती दिनों में जैनेंद्र भी कुछ सालों तक रहे, लेकिन मेरी उनसे मुलाकात नहीं हुई। अज्ञेय, अशोक वाजपेयी, केदारनाथ सिंह और नामवर सिंह से भी मेरा लंबे समय तक संबंध बना रहा। इस तरह बड़े लेखकों के संपर्क में एक साधारण छोटे लेखक के रूप में मैं हमेशा उपस्थित रहा।

अभी मेरी सोच बच्चों के लिए लिखने की अधिक रहती है, क्योंकि मैं इस उम्र में छोटा लिखता हूं और कम लिखता हूं। मेरे लिए ज्यादा देर तक किसी एक चीज पर कायम रहना बहुत कठिन है, लेखन में भी। मेरी शारीरिक और मानसिक स्थिति अब वैसी नहीं है, तब भी मैं बच्चों के लिए लिख रहा हूं।
 (अरविंद दास से बातचीत पर आधारित)

कहानी को कोई हरा नहीं सकता ...एम.टी. वासुदेवन नायर

मेरे बचपन में साहित्य, लेखन और किताबों की दुनिया का कोई अस्तित्व नहीं था। अखबार तीन दिनों की देरी से डाक द्वारा आते थे। किताब कभी-कभार ही मुझे मिलती थी। जब मैं हाईस्कूल में पहुंचा, मैंने हर चीज को पढ़ना शुरू किया। कहानियां, उपन्यास जो भी स्कूल के पुस्तकालय और नजदीक के घरों में उपलब्ध थे। पढ़ने के बाद मैं कुछ लिखना चाहता था। मैं जानता था कि मैंने जो पढ़ा है, वैसा नहीं लिख पाऊंगा, फिर भी मैंने कई पत्रिकाओं में अपनी कहानियां भेजीं। छपीं भी। मेरे घर की महिलाएं, मेरी मां और कुछ रिश्तेदारों ने मुझे बहुत प्रभावित किया। 

मेरा आदर्श हमेशा मेरी मां रही हैं। मैंने जो भी लिखा, मेरी मां ने कुछ भी नहीं पढ़ा था, फिर भी उनसे मुझे लेखन की ऊर्जा मिलती रही। मैंने बचपन में अपनी मां और चाची से काफी कहानियां सुन रखी थीं। ऐसी कहानियां जब आप बड़े भी हो जाते हो तो आपके साथ रहती हैं। इसका असर मेरे लेखन पर पड़ा। मेरे पिता जी लंबे समय तक श्रीलंका में रहे, लेकिन मैं वहां कभी नहीं जा सका। धीरे-धीरे परिस्थितियां बदलीं। पीढ़ियां गुजरीं। उस समय जैसे हम रहते थे, बाद में सब कुछ पूरी तरह बदल चुका था। 



जिंदगी को देखने का नजरिया भी बदल चुका था। यह सिर्फ मेरे मामले में नहीं था, बल्कि पूरी दुनिया के साहित्य की स्थिति भी यही थी। बदला हुआ समय मेरे लेखन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कहानी लिखने की मेरी शैली इस तरह है। जब मुझे कहानी का विचार आता है तो अधिकतर समय मैं सबसे पहले इसे मन में लिख लेता हूं। ऐसा करने के बाद ही मैं कहानी लिखने बैठता हूं। हां, जब कहानी को फिल्म का रूप दिया जाता है तो कई तरह समझौते करने पड़ते हैं। फिल्म एक अलग माध्यम है और उसके अनुसार कुछ चीजों को हटाना होता है। कई बार हम कुछ चीजों को जोड़ने के लिए स्वतंत्र होते हैं, लेकिन कहानी को कोई हरा नहीं सकता है। हां, जहां तक मेरा सवाल है, मैं हमेशा साहित्य को पसंद करता रहा हूं।
(डॉ. सुधा गोपालाकृष्णन से बातचीत पर आधारित)

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