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8 घंटे तक चला मासूम का ऑपरेशन, गर्दन और छाती हो गई थी एक

Sat, 26 May 2018 06:11 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 26 May 2018 06:11 PM IST
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after 4 years of operation of a boy which was stuck in the chest and neck one after the fire
fire accident

बच्चों को शरारत हर किसी को सुखद लगती है। वहीं, कई बार यह शरारत बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है। उत्तर प्रदेश के मेरठ निवासी वंश कुमार (8) चार साल पहले अपनी बड़ी बहन के साथ घर पर अकेला था। 

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बेड के नीचे खिलौना तलाशने के लिए वह नीचे झुका। अंधेरा होने की वजह से उसके हाथ माचिस लगा। माचिस की एक तिली ने वंश का पूरा जीवन ही बदल दिया। कपड़ों में आग लगने के बाद वह चिल्लाने लगा। आधा बदन झुलस चुका था।
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आनन-फानन में उसे अस्पताल में भर्ती कराया। करीब साढ़े तीन वर्षों तक उपचार चलता रहा। धीरे-धीरे वंश की त्वचा सिकुड़ती चली गई और उसकी गर्दन छाती से जा चिपकी। दोनों हाथ पेट से चिपक गए थे। 
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अमेरिका के चिल्ड्रेन बर्न फाउंडेशन की टीम वंश को लेकर दिल्ली स्थित मैक्स अस्पताल पहुंची। जहां विशेषज्ञों ने वंश की तीन बार सर्जरी करने और बगैर पाइप के इंजेक्शन से एनेस्थिसिया देने जैसी चुनौतियों का सामना करते हुए उसे नया जीवन दिया है। हालांकि, अभी भी वंश सामान्य नहीं है।

after 4 years of operation of a boy which was stuck in the chest and neck one after the fire
max hospital

डॉक्टरों का कहना है कि धीरे-धीरे उसकी त्वचा काफी हद तक रिकवर होगी। साथ ही उन्होंने दुनिया भर में बच्चों का ऐसा पहला केस देखने का दावा किया है। पिता मुकेश कुमार ने बताया कि झुलसने के बाद 40 दिन तक मेरठ के निजी अस्पताल में वंश भर्ती रहा। फिर उसे घर ले आए।

लोगों के बताने पर वह बिजनौर स्थित एक वैद्य के पास पहुंचे। वहां 18 महीने तक बच्चे का उपचार कराते रहे। वहीं, मदद को लेकर पीएम मोदी से सीएम अखिलेश तक गुहार लगाई लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इस बीच मेरठ के ही डॉ. नीरज ने बच्चे को ठीक करने का बीड़ा उठाया। 

करीब 40 फीसदी तक झुलसे वंश के बेहतर इलाज के लिए यूएसए के चिल्ड्रेन बर्न फाउंडेशन और मैक्स की टीम ने सोशल मीडिया के जरिये भी फंड एकत्रित किया। जबकि मैक्स ने आधे से ज्यादा इलाज को मुफ्त किया और अनोखे केस को अंजाम तक पहुंचाने का निर्णय लिया।       

पंचशील पार्क स्थित मैक्स अस्पताल के चीफ ऑफ प्लास्टिक सर्जरी डॉ. सुनील चौधरी बताते हैं कि जब वंश उनके पास आया उस वक्त उसकी गर्दन छाती से चिपकी थी। दोनों हाथ पेट से चिपके थे। उसका होठ नीचे लटका हुआ था। टीम के आगे सबसे पहले चुनौती एनेस्थिसिया देना थी।

तीन योजनाएं बनाई गईं। दो योजनाएं फेल होने के बाद तीसरी के तहत एक इंजेक्शन के जरिये एनेस्थिसिया देकर वंश की गर्दन और छाती को अलग किया। जांघ से त्वचा लेकर प्लास्टिक सर्जरी की गई। चौधरी का कहना है कि इस ऑपरेशन में स्पाई एंजियोग्राफी और 3डी प्रिंटिंग तकनीक का सहयोग ज्यादा था। 

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