विश्व पूरक आहार दिवस: उत्तराखंड के 80% बच्चे आज भी पर्याप्त पोषाहार से वंचित, विशेषज्ञों ने जताई चिंता
उत्तराखंड के 80% बच्चे आज भी पर्याप्त पोषाहार से वंचित हैं। सुधार के संकेत के बीच विशेषज्ञों ने इस पर चिंता जताई है।
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उत्तराखंड में शिशु एवं बाल पोषण की स्थिति में सुधार के संकेत जरूर मिले हैं, लेकिन हालिया आंकड़े एक गंभीर चिंता की ओर भी इशारा कर रहे हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-6, 2023-24) के अनुसार 6 से 23 माह आयु वर्ग के बच्चों में पर्याप्त आहार प्राप्त करने वालों का प्रतिशत बढ़कर 19.2 प्रतिशत हो गया है। हालांकि इसका अर्थ यह भी है कि आज भी राज्य के करीब 80 प्रतिशत बच्चे पर्याप्त और संतुलित आहार से वंचित हैं।
हिमालयन अस्पताल जौलीग्रांट के बाल रोग विभाग में तैनात डॉ. राकेश कुमार ने बताया कि बच्चों के जीवन के पहले दो वर्ष उनके शारीरिक और मानसिक विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान उचित पूरक आहार नहीं मिलने पर कुपोषण, संक्रमण और विकास संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
हालांकि सर्वेक्षण में कुछ सकारात्मक बदलाव भी दर्ज किए गए हैं। बच्चों में अवरुद्ध वृद्धि (स्टंटिंग) 27 प्रतिशत से घटकर 20 प्रतिशत और क्षीणता (वेस्टिंग) 13.2 प्रतिशत से घटकर 11 प्रतिशत हो गई है। विशेषज्ञ इसे स्वास्थ्य एवं पोषण कार्यक्रमों की सफलता मानते हैं, लेकिन उनका कहना है कि सुधार की यह गति अभी पर्याप्त नहीं है।
डॉ. कुमार के अनुसार सबसे बड़ी चिंता यह है कि अधिकांश परिवार अभी भी छह माह की आयु के बाद बच्चों को सही समय पर और पर्याप्त मात्रा में पूरक आहार नहीं दे पा रहे हैं। कई मामलों में बच्चों को केवल पतला भोजन या पोषणहीन आहार दिया जाता है, जिससे उनकी वृद्धि प्रभावित होती है।
स्थानीय खाद्य पदार्थों में छिपा है बेहतर पोषण
डॉ. राकेश बताते हैं कि उत्तराखंड के पारंपरिक खाद्य पदार्थ बच्चों के लिए उत्कृष्ट पोषण का स्रोत हो सकते हैं। मंडुवा (रागी), झंगोरा, दालें, राजमा, गहत, भट्ट, हरी सब्जियां, कद्दू, गाजर, केला, सेब, नाशपाती, दही, पनीर और अंडा जैसे खाद्य पदार्थ बच्चों के संतुलित विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि छह माह के बाद बच्चों को मंडुवे का दलिया, गाढ़ी खिचड़ी, दाल-चावल, मसले हुए फल एवं सब्जियां, उबला अंडा तथा परिवार का नरम और अच्छी तरह मसलकर बनाया गया भोजन दिया जाना चाहिए। डॉ. राकेश बताते हैं कि सिर्फ दाल का पानी नहीं, पौष्टिक और गाढ़ा भोजन जरूरी है।
स्वच्छता और प्यार से खिलाना भी उतना ही जरूर
डॉ. राकेश बताते हैं कि भोजन ताजा, स्वच्छ और विविधता से भरपूर होना चाहिए। बच्चों को प्यार और धैर्य के साथ बैठाकर खिलाना चाहिए तथा हाथों की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। जंक फूड, मीठे पेय पदार्थ, चाय और बिस्कुट जैसी कम पोषक चीजों से बचना भी जरूरी है।
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क्यों मनाया जाता है विश्व पूरक आहार दिवस
इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स का कॉम्प्लिमेंट्री फीडिंग अवेयरनेस डे हर साल 6 जून को मनाया जाता है। इसका मकसद माता-पिता और हेल्थकेयर वर्करों को यह बताना है कि बच्चे के 6 महीने के होने पर ब्रेस्ट मिल्क के साथ-साथ सुरक्षित और पौष्टिक ठोस आहार देना कितना जरूरी है। इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स भारत में बाल रोग विशेषज्ञों का सबसे बड़ा और प्रमुख पेशेवर संगठन है। यह संस्था शिशुओं, बच्चों और किशोरों के स्वास्थ्य, पोषण और चिकित्सा देखभाल को बेहतर बनाने के लिए समर्पित है।