World Environment Day: जिन बुग्यालों पर नाज...वो संकट में आज, हिमालय में पीछे खिसक रही है ट्री लाइन
पर्वतीय ट्री लाइन कई जगह औसतन हर साल चार फीट (1.2 मीटर) की दर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर शिफ्ट हो रही है। दुनिया भर में 243 से अधिक पर्वत श्रृंखलाओं पर 10 लाख किलोमीटर क्षेत्र में पर्वतीय ट्री लाइन में हो रहे बदलावों के अध्ययन किया गया।
विस्तार
उत्तराखंड के बुग्याल विश्व प्रसिद्ध हैं, यह सुंदर व शांत होने के साथ दुर्लभ वनस्पति और जड़ी-बूटियों का घर भी हैं। लेकिन अब यह बुग्याल खतरे में हैं। इसकी वजह है जलवायु परिवर्तन से हिमालय में पीछे खिसक रही ट्री लाइन। जाहिर है जब ट्री लाइन पीछे खिसकेगी तो नर्म घास वाले हिमालयी बुग्यालों पर पेड़-पौधों का कब्जा हो जाएगा और कई औषधीय प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच जाएंगी।
वैज्ञानिक बताते हैं कि दुनियाभर में 70 फीसदी ट्री लाइन ऊंचाई की ओर शिफ्ट हो गई है। उनका कहना है कि पर्वतीय ट्री लाइन कई जगह औसतन हर साल चार फीट (1.2 मीटर) की दर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर शिफ्ट हो रही है। उन्होंने दुनिया भर में 243 से अधिक पर्वत श्रृंखलाओं पर 10 लाख किलोमीटर क्षेत्र में पर्वतीय ट्री लाइन में हो रहे बदलावों के अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष दिया है। इसके लिए उन्होंने उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों की भी मदद ली है।
औषधीय वनस्पति विलुप्त होने की कगार पर
इससे पता चला है कि 2000 से 2010 के बीच 70 फीसदी वृक्ष क्षेत्र ऊपर की ओर शिफ्ट हो गए हैं। हालांकि उत्तराखंड के लिए राहत की बात यह है कि अभी यहां रफ्तार धीमी है। हैप्रेक के शोध में पता चला है कि तुंगनाथ में बुग्याल एक से दो फीट पीछे जा रहे हैं। इसकी वजह वातावरण में बदलाव भी है। जिससे मई में बारिश हो रही है और इसका बुग्यालों पर भी असर पड़ रहा है।
बुग्याल कई प्रजातियों का घर हैं। जलवायु परिवर्तन का असर धीरे-धीरे हिमालय की वनस्पतियों पर पड़ रहा है। निचले इलाकों में मिलने वाली वनस्पति मध्य हिमालयी क्षेत्रों में शिफ्ट हो चुकी है, वहीं मध्य हिमालय में उगने वाले पेड़-पौधे अब उच्च हिमालय में उगने लगे है। जिससे बुग्यालों में उगने वाली दुर्लभ वनस्पति और जड़ी-बूटियों को उगने के लिए स्थान नहीं मिल रहा है। वैज्ञानिक कहते हैं कि ऐसे ही ट्री लाइन खिसकती रही तो जल्द ही कई औषधीय वनस्पति विलुप्त होने की कगार पर पहुंच जाएंगी।
ट्री लाइन क्या है
किसी क्षेत्र में ट्री लाइन या वृक्ष रेखाएं, पर्यावास की वो सीमा होती हैं, जिसके पार पर्यावरण की विषम परिस्थितियों जैसे बहुत कम तापमान, अपर्याप्त वायु दाब या आर्द्रता की कमी के चलते पेड़ उग पाने में असमर्थ होते हैं। ट्री लाइन को एक ऐसी कृत्रिम सीमा के रूप में समझ सकते हैं, जिसके पार पेड़ों का विकास अवरुद्ध हो जाता है। इसके आगे वो अक्सर घनी झाड़ियों के रूप में ही उगते हैं।
फायदा या नुकसान
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ट्री लाइन के ऊपर शिफ्ट होने के क्या प्रभाव होंगे। लेकिन पहाड़ों पर अत्यधिक ऊंचाई पर जहां पहले पेड़ नहीं होते थे वहां भी इनका विस्तार होगा। यह फायदेमंद लग सकता है क्योंकि ज्यादा पेड़ों का मतलब है कि वातावरण से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड को सोख लिया जाएगा।
इसके साथ ही इसकी वजह से कुछ प्रजातियों में भी विस्तार हो सकता है। लेकिन दूसरी तरफ इस वजह से ऊंचाई पर मौजूद टुंड्रा क्षेत्र घट जाएगा, जिससे ठंडे वातावरण वाले बुग्याल यानी अल्पाइन घास के मैदानों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। यह क्षेत्र न केवल मवेशियों के लिए चरागाह के रूप में उपयोग किए जाते हैं, बल्कि अपने अंदर एक अलग इकोसिस्टम को समेटे हुए हैं। ऐसे में यदि यह नष्ट होते हैं तो इनके साथ इनमें मौजूद दुर्लभ वनस्पतियां, जैवविविधता और अन्य जड़ी बूटियां भी विलुप्त हो सकती हैं।
ट्री लाइन पीछे खिसकने और बुग्यालों में पेड़ उगने की वजह के बारे में हेप्रेक के वैज्ञानिक डॉ विजयकांत पुरोहित का कहना है कि कई बार निचले इलाकों के बीज उड़कर या अन्य वजहों से बुग्यालों में आ जाते हैं और अनुकूल वातावरण मिलने से उनके पौधे उगने लगते हैं। जैसे वैली आफ फ्लावर में पहले पेड़ नहीं थे अब देवदार उग रहे हैं। अभी तक बुग्यालों में भोजपत्र ही होते थे।
बुग्यालों में बढ़ा तापमान तो होगा नुकसान
गढ़वाल विश्वविद्यालय के हेप्रेक संस्थान के वैज्ञानिक डॉ विजयकांत पुरोहित का कहना है कि ट्री लाइन तेजी से पीछे खिसकेगी तो हिमालयी क्षेत्रों व बुग्यालों पर पेड़-पौधों का कब्जा हो जाएगा और गर्मी बढ़ती रही तो ग्लेशियरों के पिघलने का सिलसिला बढ़ेगा। उन्होंने बताया कि बुग्याल बर्फ गिरने पर फॉरेस्ट कवर का काम कर पानी को सोखते हैं। स्नो एरिया कम होने पर जमीन की नमी खत्म होने से पानी के स्रोत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। वहीं तमाम जड़ी बूटियों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा, क्योंकि यह पौधे बुग्यालों की नर्म घास के साथ विकसित होते हैं। इससे कालाबांसा जैसे खरपतवार ऊपर आने से बुग्यालों की सुंदरता भी खत्म हो जाएगी।
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