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World Environment Day 2021 : बड़ी परियोजनाओं ने भी पर्यावरण का किया कबाड़ा, कुदरती आपदाओं की संख्या बढ़ी 

Sat, 05 Jun 2021 02:20 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 05 Jun 2021 02:20 PM IST
सार

प्रकृति ऐसे रौद्र रूप दिखा रही है कि वैज्ञानिक जगत भी चकित है। बादल फटने यानी अचानक अत्यधिक भारी बारिश होने की घटनाएं भी आम होती जा रही हैं।

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world environment day 2021 : big projects also became dangerous
हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

विस्तार

पहाड़ में हमेशा बड़ी बांध परियोजनाओं का विरोध और छोटी परियोजनाओं के पैरोकार पद्मविभूषण सुंदरलाल बहुगुणा हमसे दूर हो गए, लेकिन इस पर्यावरण दिवस पर भी उनकी पर्यावरण के प्रति चिंताएं लाजिमी हैं। ऋषिगंगा आपदा हम सबके जेहन में ताजा है।

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World Environment Day 2021 : जलवायु परिवर्तन से गड़बड़ा रहा हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र
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वैज्ञानिकों ने इस आपदा के पीछे अप्रत्यक्ष तौर पर निर्माण और पर्यावरणीय नुकसान को जिम्मेदार माना था। इसके बाद पहाड़ ने तीन से ज्यादा बादल फटने की घटनाओं का दंश झेला है। पिछले एक दशक में इस तरह की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। प्रकृति ऐसे रौद्र रूप दिखा रही है कि वैज्ञानिक जगत भी चकित है। बादल फटने यानी अचानक अत्यधिक भारी बारिश होने की घटनाएं भी आम होती जा रही हैं।
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विश्व पर्यावरण दिवस 2021: नदियां, झीलें, बुग्याल और प्रकृति का अनूठा संसार है उत्तराखंड

हमने उत्तराखंड के इन नौजवान पहाड़ों को बेशुमार दर्द दिए हैं। एक ओर जहां ऑल वेदर रोड सहित तमाम बड़े निर्माण कार्य पहाड़ का सीना चीरकर हो रहे हैं। उनकी सामग्री नदियों में खिसकाने की शिकायतें भी आम हैं। जबकि दूसरी ओर, नदियों की बड़ी जल विद्युत परियोजनाएं भी प्राकृतिक असंतुलन पैदा कर रही हैं। वैज्ञानिक जगत लगाता चेता रहा है, आने वाले वक्त में इसका गंभीर खामियाजा भुगतान पड़ सकता है।

24 परियोजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई है रोक
उत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2005 से 2010 के बीच दो दर्जन से अधिक जलविद्युत परियोजनाओं की मंजूरी दी थी। तीस हजार करोड़ की लागत वाली इन परियोजनाओं के पूरा होने से 2944.80 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा। गैर सरकारी संगठनों की ओर से एक-एक कर 24 छोटी-बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया।

यह प्रकरण एनजीटी भी पहुंचा हुआ है। अदालत के आदेश पर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने विशेषज्ञों की 12 सदस्यीय समिति गठित की थी। कई महीने के अध्ययन के बाद समिति ने अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को दे दी थी। मंत्रालय की ओर से यह रिपोर्ट अदालत को सौंप दी गई, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इन 24 परियोजनाओं पर रोक लगा दी थी।

केवल पर्यावरण दिवस मनाएंगे तो पर्यावरण के लिए बढ़ेंगे खतरे

रक्षा सूत्र आंदोलन के प्रणेता सुरेश भाई ने कहा है कि वनों का व्यावसायिक कटान पर्यावरण के लिए खतरा बन रहा है। उन्होंने कहा कि हम हर साल केवल पर्यावरण दिवस मनाने तक सीमित रहेंगे तो इससे पर्यावरण पर खतरे और बढ़ेंगे।

सुरेश भाई ने कहा कि प्रदेश के पर्यावरण पर बहुत खतरा है। जिन पेड़ों को बचाने के लिए लोग वर्षों से आंदोलन करते रहे हैं, उनकी व्यावसायिक कटाई बड़ी तेजी से हो रही है। ऊंचाई पर स्थित वनों की दुर्लभ वन प्रजाति कैल, राई, खर्सू, मुरेंडा, देवदार, मौरू आदि के पेड़ों की हजामत हो रही है।

उत्तराखंड, हिमालय के जल ग्रहण क्षेत्रों में कोई भी जाकर देख सकता है कि सड़क मार्गो पर बड़े पैमाने पर लकड़ी के स्लीपरों के ढेर लगे हुए हैं। यहां से इनको हर रोज दर्जनों ट्रक पर रायवाला और हल्द्वानी डिपो में पहुंचाया जा रहा है। उन्होंने पहले प्रमुख वन संरक्षक को हरे पेड़ों को काटने की तस्वीरें भेजी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को पत्र लिखा।

उन्होंने फारेस्ट प्रोटेक्शन डिवीजन के द्वारा उत्तराखंड के प्रमुख सचिव (वन) को शीघ्र ही हरे पेड़ों की कटाई के जांच के आदेश दिये थे। कोरोना संक्रमण के चलते हमने महसूस किया कि अधिकारियों को जंगल में पहुंचने में शायद दिक्कतें होंगी। तो हमने फिर जांच होने तक वनों के कटान के लिए भेजे गए मजदूरों को कटर मशीन के साथ जंगल से वापस बुलाने की मांग की थी।

उन्होंने कहा कि हो सकता है कि किन्हीं क्षेत्रों में मजदूरों की वापसी कराई गई हो लेकिन सड़कों के किनारे आजकल भारी मात्रा में लकड़ी के ढेर हैं, जहां से निकासी हो रही है। कहा कि उत्तराखंड बाढ़ व भूस्खलन के लिए बहुत संवेदनशील है। यहां पेड़ों के कटान से वनों की जैव विविधता को भारी नुकसान होता है। गांव के लोगों ने अपना जंगल वर्षों से पाल रखा है। वर्तमान समय में वनों की व्यावसायिक कटाई को रोकने के लिये आगे आना होगा। यदि ऐसा नहीं कर पाये तो पहाड़ नंगे हो जायेंगे। जलवायु परिवर्तन की समस्या तेजी से बढ़ेगी। पानी के स्रोत सूखेंगे।

पर्यावरण दिवस पर शुरू होगा गंगा क्वेस्ट का दूसरा चरण
वहीं विश्व पर्यावरण दिवस से गंगा क्वेस्ट का दूसरा चरण शुरू हो गया है। इसके लिए पंजीकरण शुरू हो चुके हैं। अभी तक 1.1 मिलियन से ज्यादा लोग इसके लिए पंजीकरण करा चुके हैं। गंगा समेत अन्य नदियों और पर्यावरण पर आधारित गंगा क्वेस्ट एक क्विज प्रतियोगिता है, जो कि शैक्षणिक कार्यक्रम के जरिए विशेष रूप से युवाओं, बच्चों और छात्रों को गंगा एवं अन्य नदियों के संरक्षण और संवर्धन के प्रति संवेदनशील बनाने के उद्देश्य से पहली बार 2019 में शुरू की गई थी। इस क्विज का आयोजन राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन, जल शक्ति मंत्रालय और ट्री क्रेज फाउंडेशन के सहयोग से किया जाता है।

इस वर्ष अप्रैल और मई माह में कोविड-19 महामारी की चुनौतीपूर्ण स्थिति के बावजूद इस क्विज के लिए 1.1 मिलियन से अधिक लोग रजिस्ट्रेशन करवा चुके हैं। क्विज में न सिर्फ देश भर से बल्कि यूएई, ओमान, यूके, अल्जीरिया, बहरीन और कुवैत से भी अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं। इसे हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में आयोजित किया जा रहा है। ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को क्विज से जोड़ा जा सके।

इस बार गंगा क्वेस्ट 2021 के लिए सबसे ज्यादा हिस्सेदारी झारखंड, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से हुई है। गंगा क्वेस्ट 2021 के पहले दौर के 216 विजेता पांच जून से प्रतियोगिता के दूसरे चरण में प्रवेश करेंगे। इन विजेताओं में प्राथमिक विद्यालय के छात्रों से लेकर वरिष्ठ नागरिकों तक सभी आयु समूहों के लोग हैं। इन विजेताओं में 110 पुरुष जबकि 106 महिलाएं शामिल हैं। इन सभी विजेताओं में 215 भारतीय प्रतिभागी, जबकि 1 विजेता यूएई से है।

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