World Environment Day 2021 : जलवायु परिवर्तन से गड़बड़ा रहा हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र
जलवायु परिवर्तन, आबादी और शहरीकरण का विस्तार, विकास के नाम पर कटते वन सरीखे कई अन्य कारण हैं, जो पारिस्थितिकी के लिए चुनौती हैं।
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जलवायु परिवर्तन में आ रही विषमताओं और मानव द्वारा प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से हिमालयी क्षेत्रों का पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा रहा है। मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा हिमालयी क्षेत्रों में इसका असर अधिक देखने को मिल रहा है।
विश्व पर्यावरण दिवस 2021: नदियां, झीलें, बुग्याल और प्रकृति का अनूठा संसार है उत्तराखंड
राज्य के पर्यावरण में पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए संतुलन को साधने के लिए एक तंत्र को विकसित किए जाने की आवश्यकता थी, लेकिन अभी तक इस दिशा में सरकारों के स्तर पर प्रयास होते नहीं दिख रहे हैं। जलवायु परिवर्तन, आबादी और शहरीकरण का विस्तार, विकास के नाम पर कटते वन सरीखे कई अन्य कारण हैं, जो पारिस्थितिकी के लिए चुनौती हैं।
इसके चलते हिमालयी क्षेत्रों में तमाम तरह के बदलाव देखने को मिल रहे हैं। हर नदी, झील, जंगल, वेटलैंड और यहां तक की एक घाटी का अपना एक पारिस्थितिकी तंत्र होता है, जो मनुष्य के लगातार हस्तक्षेप से प्रभावित हो रहा है।
तेजी से विकसित हो रहे पैरी अर्बन एरिया जंगलों को निगल रहे हैं, तो नदियों ने अपना स्वरूप बदलना शुरू कर दिया है। वो लगातार सिकुड़ रही हैं। सदानीर रहने वाली कई नदियों में अब मानसून के सीजन में ही पानी दिखाई देता है तो झीलों का हम किस तरह से लगातार दोहन कर रहे हैं, ये सबसे बड़ा उदाहरण नैनीताल स्थित नैनी झील है।
जिसके बिगड़ते पारिस्थितिकी तंत्र को लेकर वैज्ञानिक कई बार सवाल उठा चुके हैं। कंजर्वेशन रिजर्व भी सुरक्षित नहीं रह गए हैं। मानवीय हस्तक्षेप वन्य जीवों के संसार को लगातार प्रभावित कर रहा है। खपत के बीच प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। मध्य हिमालयी क्षेत्र में एक ओर औसत वर्षा में कमी आ रही है, वहीं मौसम चक्र में परिवर्तन से यहां की कृषि और फलोत्पादन में भी इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है।
लगभग 10 लाख प्रजातयों को हम खोने की तैयारी में
अब जब कई तरह के संकट में अपने को घिरते देखा, तब तक देर हो चुकी। आज जब 25 प्रतिशत सभी तरह की जैवविविधता हम खो चुके और लगभग 10 लाख प्रजातयों को हम खोने की तैयारी में हैं तो समझा जा सकता है कि हम कितने बड़े दोषी हैं। इनको खोने तक ही बात खत्म नहीं होती। इसके साथ बहुत सी अन्य बातें भी जुड़ी हैं। जिनकी समझ हमारे बीच में नहीं है। मसलन किसी भी तंत्र को प्रभावी व उपयोगी बनने के लिए कई तरह की पतस्थितिकी प्रक्रियाओं से होकर गुजरना पड़ता है। उसमें उपस्थित सभी तरह के सूक्ष्म से लेकर बड़े जीव व पेड़-पौधों का योगदान उसको उपयोगी बनाने में होता है। किसी भी एक के तंत्र से खोने का मतलब इस महीन प्रक्रिया के रुक जाने से जुड़ा होता है, जिसका असर समयोपरांत दिखाई देता है।
- डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, पर्यावरणविद्
जलवायु परिवर्तन और तापमान बढ़ने से हिमालयी क्षेत्रों में वनस्पतियां भी अपना स्थान बदलकर ऊंचाई वाले क्षेत्रों की बढ़ रही हैं। जिन्हें हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सही नहीं माना जा सकता। तापमान में हो रही वृद्धि ग्लेशियरों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। वे तेजी से पिघल रहे हैं। सदानीरा रहने वाली नदियों का भविष्य इससे संकट में है। वर्तमान में हमारी सोच मोटर-गाड़ी-बंगला तक सीमित होकर रह गई है। प्रकृति को हम भूलते जा रहे हैं। ये भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं हैं।
- विनोद जुगलान, पर्यावरण सचेतक व शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के उत्तराखण्ड प्रांत पर्यावरण प्रमुख
पृथ्वी पर प्रत्येक मनुष्य का जीवन बचा रहे, इसके लिए प्रत्येक परिस्थितिक तंत्र का बने रहना जरूरी है। पारिस्थितिक तंत्र का संतुलन और पारिस्थितिक तंत्र से संतुलन इन दोनों का ही महत्त्व है। प्रत्येक वेटलैंड का अपना पर्यातंत्र होता है अर्थात पारिस्थितिक तंत्र होता है। जैव विविधता होती है, वानस्पतिक विविधता होती है। ये वेटलैंड जलजीवों, पक्षियों आदि प्राणियों के आवास होते हैं। वेटलैंड के जल संरक्षण, जल प्रबंधन के पीछे यही उद्देश्य है कि जल के संरक्षण के साथ-साथ उनके पारिस्थितिक तंत्र को भी संरक्षण दिया जाए।
- प्रो.पीसी तिवारी, विभागाध्यक्ष डीएसबी परिसर नैनीताल