विवेक हत्याकांड: दून के एक पुलिसकर्मी की फेसबुक पोस्ट हो रही वायरल, जांच का आदेश जारी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लखनऊ में एपल कंपनी के मैनेजर विवेक तिवारी हत्याकांड में एक सिपाही की गिरफ्तारी को लेकर यूपी में शुरू हुए पुलिसकर्मियों के आंदोलन की आंच उत्तराखंड तक पहुंच गई है।
उत्तराखंड में भी कुछ पुलिसकर्मी सोशल मीडिया पर आरोपी पुलिसकर्मी का समर्थन कर रहे हैं। देहरादून में तैनात बताए जा रहे एक पुलिसकर्मी की फेसबुक पोस्ट वायरल हुई। सिपाही ने लखनऊ की घटना में सिस्टम और सिपाही पर हुई कार्रवाई पर अलग तरीके से तंज कसा है। मामले में एडीजी लॉ एंड ऑर्डर ने जांच के निर्देश दिए हैं।
बता दें कि लखनऊ में विवेक तिवारी हत्याकांड के बाद वहां के पुलिसकर्मी आरोपी सिपाही के पक्ष में आंदोलन कर रहे हैं। कई जनपदों में पुलिसकर्मियों के काली पट्टी बांधकर काम करने की बात सामने आई है। इधर उत्तराखंड में भी कुछ पुलिसकर्मियों के सोशल मीडिया के जरिये इस आंदोलन में शरीक होने की बात सामने आ रही है।
एक सिपाही की फेसबुक पोस्ट वायरल हुई
एक दिन पहले अपर पुलिस महानिदेशक ने इस मामले में सोशल मीडिया की निगरानी करने के निर्देश दिए थे। इस मामले में एक सिपाही की फेसबुक पोस्ट वायरल हुई। इस पोस्ट में सिपाही ने एक ऐसी रिवाल्वर का फोटो शेयर किया है जिसकी बैरल (नली) आगे न होकर पीछे की तरफ है। कमेंट किया है कि ‘सरकार द्वारा दी गई पुलिस को रिवाल्वर’। यह पोस्ट लखनऊ में हुई घटना के अगले दिन का है। इसी दिन आरोपी सिपाही की गिरफ्तारी हुई थी।
एक अन्य पोस्ट में सिपाही ने आरोपी सिपाही की क्षतिग्रस्त बाइक का फोटो भी शेयर किया है। इस फोटो के साथ उसने अप्रत्यक्ष रूप से विवेक तिवारी की गलती को बताता हुआ कमेंट लिखा है। लिखा है कि एक्सयूवी तो पूरे विश्व ने देख ली, मगर बाइक का फोटो हम आपको दिखाते हैं। इसके अलावा उसने घटनास्थल पर विवेक की एक महिला के साथ मौजूदगी को भी गलत ठहराया है।
उसकी दोनों पोस्ट को आगे भी कुछ लोगों ने शेयर किया और कई लोगों को टैग भी किया गया है। जब मामला एडीजी अशोक कुमार के संज्ञान में आया तो उन्होंने इसकी जांच कराने के निर्देश दिए। इसके साथ ही सभी जिलों के पुलिस प्रभारियों को अपने जिलों में पुलिसकर्मियों की हरकतों पर नजर रखने के भी आदेश दिए हैं।
उत्तराखंड के पुलिसकर्मियों के अंदर भी आंदोलन का गुबार
उत्तराखंड के पुलिसकर्मियों के अंदर भी आंदोलन का गुबार दबा हुआ है, जिसे समय-समय पर हवा भी मिलती रहती है।
बीते तीन वर्षों के अंदर एक बार ‘मिशन आक्रोश’ आंदोलन हुआ तो दूसरी बार ‘मिशन महाव्रत’ को शुरुआत से पहले ही उसे दबा दिया गया। हालांकि यहां किसी कार्रवाई विशेष में नहीं बल्कि अपनी वेतन संबंधी मांगों को लेकर आंदोलन की बात उठती है। पुलिसकर्मियों के आंदोलन की सुगबुगाहट के चलते खुफिया विभाग लगातार गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है।
अगस्त 2015 में उत्तराखंड के सिपाहियों के बीच वेतन विसंगति समेत कई मांगों को लेकर ‘मिशन आक्रोश’ आंदोलन की बातें कही जा रही थी। आंदोलन 16 अगस्त 2015 को किया जाना था। इसकी भनक जैसे ही आला अधिकारियों को लगी तो उनके होश उड़ गए। लिहाजा इस आंदोलन को शुरुआत से पहले ही दबाने का प्रयास किया गया। लगातार नजर रखी गई और खुफिया तंत्र को सक्रिय कर दिया गया। इससे हुआ ये कि आंदोलन बड़े स्तर पर तो नहीं हो सका, मगर निर्धारित तिथि पर कुछेक जगहों पर सिपाहियों ने आंदोलन शुरू कर दिया।
सिपाहियों ने काली पट्टी बांधकर ड्यूटी की और उसकी तमाम फोटो को सोशल मीडिया पर वायरल किया गया। अब तलाश हुई उन सिपाहियों और लोगों की जिन्होंने इस आंदोलन को हवा दी। तमाम प्रयासों के बाद 26 अगस्त 2015 को इस मामले में टिहरी के एक सिपाही को हरिद्वार से गिरफ्तार कर लिया गया। इसके साथ ही दो युवकों को भी गिरफ्तार किया गया, जो इस आंदोलन में अप्रत्यक्ष रूप से भाग ले रहे थे। मामले की जांच हुई और तीन सिपाहियों को बर्खास्त कर दिया गया।
2018 में फिर से मिशन महाव्रत की सुगबुगाहट शुरू
इसके करीब ढाई साल बाद जनवरी 2018 में फिर से इसी कड़ी में मिशन महाव्रत की सुगबुगाहट शुरू हो गई। इस बार अधिकारियों को काफी पहले इसका पता चल गया। लिहाजा आंतरिक जांच के बाद ही दो सिपाहियों के नाम सामने आए, जिन्होंने इसे शुरू करने का प्रयास किया। इसके बाद दोनों सिपाहियों को सस्पेंड कर इस आंदोलन को शुरू होने से पहले ही कुचल दिया गया।
ये हैं यहां के सिपाहियों की मांगे
- वेतन विसंगति को दूर किया जाए
- अवकाश के दिन काम करने का अतिरिक्त भुगतान किया जाए
- खुफिया विभाग की तर्ज पर जोखिम भत्ता दिया जाए।
अनुशासित बल को इस तरह की गतिविधियों में भाग नहीं लेना चाहिए। इस साल भी आंदोलन की बात सामने आई थी, मगर समय रहते इसे रोक लिया गया। साल 2015 में जो आंदोलन हुआ था उसके बाद से पुलिस लगातार सतर्क है।
- अशोक कुमार, अपर पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था)