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Uttarkashi: प्राकृतिक नहीं, इंसानी भूल का नतीजा है सिलक्यारा हादसा, जाने-माने भू वैज्ञानिक ने बताई ये लापरवाही

Sat, 18 Nov 2023 11:47 AM IST
रेनू सकलानी आफताब अजमत, अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
आफताब अजमत, अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: रेनू सकलानी Updated Sat, 18 Nov 2023 11:47 AM IST
सार

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रॉक मैकेनिक्स के पूर्व निदेशक डॉ. पीसी नवानी ने बताया कि जहां से टनल कोलेप्स हुई, वह जोन काफी कमजोर था। टनल बनाने के दौरान निर्माण टीम को जो डिजाइन पैटर्न दिया गया था, उसी पर वह काम करते रहे।

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Uttarkashi Tunnel Collapse Silkyara Former director Geological Survey of India said result of human error
उत्तरकाशी में टनल में फंसे मजदूरों को निकालने के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन जारी। - फोटो : amar ujala

विस्तार

उत्तरकाशी के सिलक्यारा में हुआ टनल हादसा प्राकृतिक नहीं इंसानी भूल का नतीजा है। जाने-माने भू वैज्ञानिक डॉ. पीसी नवानी ने ये बात कही है। उन्होंने कहा कि टनल निर्माण के दौरान जोन के हिसाब से सपोर्ट सिस्टम लगाया गया होता तो ये हादसा नहीं होता। उन्होंने हिमालय के लिए सुरंग निर्माण को सबसे सुरक्षित बताया।

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जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रॉक मैकेनिक्स के पूर्व निदेशक डॉ. पीसी नवानी ने बताया कि जहां से टनल कोलेप्स हुई, वह जोन काफी कमजोर था। टनल बनाने के दौरान निर्माण टीम को जो डिजाइन पैटर्न दिया गया था, उसी पर वह काम करते रहे।

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रॉक मास के हिसाब से उन्होंने सपोर्ट सिस्टम में बदलाव नहीं किया। बताया कि टनल निर्माण के दौरान लगातार भूगर्भीय हालातों की भी निगरानी करनी पड़ती है, जिससे नाजुक जोन में अलर्ट मिलता है और उसी हिसाब से सपोर्ट सिस्टम (सुरक्षा उपाय) बदलने पड़ते हैं। यानी भूगर्भीय परिस्थितियों के हिसाब से डिजाइन पैटर्न में बदलाव किया जाता है। उन्होंने कहा कि हादसे में अभी तक जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि टनल का ये हादसा प्राकृतिक नहीं मानवीय भूल का नतीजा है।

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मनेरी भाली-2 की 16 किमी टनल में 500 मीटर था ऐसा हिस्सा

डॉ. पीसी नवानी ने बताया कि उत्तरकाशी की मनेरी भाली-2 परियोजना की 16 किमी की टनल का निर्माण उनकी निगरानी में हुआ था। इस सुरंग में 500 मीटर का हिस्सा ऐसा था, जिसे ''श्रीनगर थ्रस्ट'' बोलते हैं। बताया कि इस हिस्से की मिट्टी बेहद भुरभुरी थी, जो जरा सी ड्रिल पर नीचे जा रही थी। लिहाजा, उसी हिसाब से डिजाइन पैटर्न में बदलाव करके काम किया गया, जो कि बिना रुकावट के पूरा हुआ।

टनल व्यास के तीन गुना ऊंचाई तक का हिस्सा ही संवेदनशील

डॉ. पीसी नवानी ने बताया कि सुरंग के कुल व्यास के ऊपर का तीन मीटर हिस्सा ही संवेदनशील होता है। इसके गिरने-धंसने का खतरा रहता है। इससे ऊपर कोई खतरा नहीं है। कमजोर हिस्से के हिसाब से ही सपोर्ट देना पड़ता है।

ये भी पढ़ें...Uttarkashi Tunnel Collapse: बड़ा सवाल...इमरजेंसी में काम आता है ह्यूम पाइप, तो टनल से किसने और क्यों निकाला?

सुरंगों से हिमालय को खतरा नहीं

विशेषज्ञ डॉ. नवानी ने बताया कि सुरंगों से हिमालय को कोई खतरा नहीं है। सुरक्षित तरीके से टनल निर्माण होने के बाद ये 100 से 150 साल तक चलती है। जबकि सामान्य तौर पर सड़कें हर साल आपदा में टूट जाती हैं।

 

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