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देवभूमि के इस हिल स्टेशन से है नोबेल पुरस्कार से नवाजे गए प्रो. एम स्टैनली विटिंघम का नाता

Sat, 12 Oct 2019 12:45 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal चंदन बंगारी, अमर उजाला, रुद्रपुर
चंदन बंगारी, अमर उजाला, रुद्रपुर Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 12 Oct 2019 12:45 PM IST
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uttarakhand this hill station connected with Nobel Prize awardee M Stanley Wittingham
प्रो. एम स्टैनली को अपना गुरु मानते हैं अल्मोड़ा निवासी डॉ. शैलेश उप्रेती - फोटो : अमर उजाला

रसायन विज्ञान के लिए इस बार नोबेल पुरस्कार से नवाजे गए प्रो. एम स्टैनली विटिंघम का नाता अल्मोड़ा के मनान निवासी और अमेरिका के नामी उद्यमियों में शुमार वैज्ञानिक डॉ. शैलेश उप्रेती से भी है। नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. स्टैनली को डा. शैलेश अपना गुरु मानते हैं। शैलेश अपनी तरक्की के पीछे स्टैनली विटिंघम का गहरा योगदान मानते हैं।

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लिथियम बैटरी में पांच साल तक प्रो. विटिंघम के मार्गदर्शन में रिसर्च करने के बाद आज शैलेश अपनी कंपनी का संचालन कर रहे हैं। तीन साल पहले 20 घंटे से अधिक बैकअप की लिथियम बैटरी की क्रांतिकारी खोज करने वाले शैलेश साढ़े तीन करोड़ रुपये का पुरस्कार भी जीत चुके हैं। 
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शैलेश की सफलता की कहानी 

अल्मोड़ा के मनान निवासी डॉ. शैलेश उप्रेती ने अल्मोड़ा से एमएससी करने के बाद आईआईटी दिल्ली से ऑयल ऑफ पॉलिमर विषय में पीएचडी की। न्यूयार्क के बिंगम्टॉन शहर से फोन पर प्रो. शैलेश ने बताया कि वर्ष 2006 में विटिंघम भारत के दौरे पर दिल्ली आए थे। उस समय वह (शैलेश) आईआईटी फाइनल वर्ष में थे। उनके कार्य और पब्लिकेशन से विटिंघम बहुत प्रभावित हुए थे।

विटिंघम ने उनकी काबिलियत परखते हुए अपने साथ न्यूयार्क में काम करने का ऑफर दिया था। इसके बाद उन्होंने न्यूयार्क जाकर प्रोफेसर विटिंघम के मार्गदर्शन में लिथियम बैटरी पर पांच साल तक रिसर्च की। वर्ष 2011 में लिथियम बैटरी बनाने की खुद की सी4वी नाम की कंपनी खोली। बताया कि विटिंघम उनकी कंपनी के सलाहकार हैं। वह हमेशा उन्हें टेक्निकल और नॉन टेक्निकल सपोर्ट करते हैं। विटिंघम ब्रिटेन में पैदा जरूर हुए लेकिन वह अमेरिका में बस चुके हैं। 
 

गुरु को मिले नोबेल से गर्वित हैं डॉ. शैलेश

शैलेश का कहना है कि गुरु को पुरस्कार मिलना बेहद गर्व की बात है। उन्होंने बताया कि उनके गुरु स्टेट यूनिवर्सिटी बिंगम्टॉन के प्रो. एम. स्टैनली विटिंघम को नोबेल मिलने से उत्सव का माहौल है। बताया कि सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में स्टैनली विटिंघम और उनका दफ्तर आमने सामने हैं।

बता दें कि रसायन विज्ञान के क्षेत्र में इस बार लिथियम बैटरी का आविष्कार करने पर प्रो. एम. स्टैनली विटिंघम, जॉन बी. गुडएनफ और अकीरा योशिनो को संयुक्त रूप से दिया नोबेल पुरस्कार दिया गया है। डॉ. शैलेश के छोटे भाई अशोक उप्रेती काशीपुर महाविद्यालय में बीएड विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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पहाड़ की लोक संस्कृति से है शैलेश को लगाव 

अमेरिका में कामयाब उद्यमी के रूप में स्थापित होने वाले डॉ. शैलेश ने अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा है और उनका पहाड़ की बोली, संस्कृति और परंपराओं से गहरा लगाव है। उन्होंने बेड़ूपाको नाम से वेबसाइट बनाने के साथ ही उत्तराखंड रेडियो भी शुरू किया था। यह रेडियो चार साल पहले अमेरिका में लांच हुआ था। रेडियो में पहाड़ की लोक संस्कृति पर आधारित गीतों के साथ ही लोकगाथाओं सहित विभिन्न जानकारियां दी जाती हैं। 

पिछले साल शैलेश के साथ भारत आए थे प्रो. विटिंघम 

नोबेल पुरस्कार हासिल करने वाले प्रो. स्टैनली विटिंघम पिछले साल अपने शिष्य शैलेश के साथ भारत आए थे। शैलेश ने बताया कि उन्होंने भारत में भी लिथियम आयन बैटरी के निर्माण की योजना बनाई है। इसकी संभावना तलाशने के लिए ही वह विटिंघम के साथ आए थे। इस संबंध में विटिंघम ने उन्हें काफी कुछ मदद की है, इसका परिणाम भविष्य में सामने होगा।

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