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उत्तराखंड की राजनीति में फिर हाशिये पर दिखेंगे क्षेत्रीय दल!
अमर उजाला, देहरादून
Updated Sat, 08 Mar 2014 01:41 PM IST
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उत्तराखंड में अब तक हुए लोकसभा चुनावों में क्षेत्रीय दल कोई बड़ी छाप नहीं छोड़ पाए हैं।
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सबसे पुराने उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) का राज्य गठन से पूर्व जो जनाधार लोकसभा चुनाव में दिखा वह राज्य गठन के बाद हुए चुनावों में लगातार मतदाता प्रतिशत खो रहा है।
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आपसी मतभेदों की भेंट चढ़े उक्रांद के अलावा सांसद टीपीएस रावत के गठित उत्तराखंड रक्षा मोर्चा का आम आदमी पार्टी में विलय हो गया है।
उत्तराखंड रक्षा मोर्चा भी बिखर गया
वर्ष 2012 विधानसभा चुनावों में उक्रांद के हिस्से एक सीट आई है, जबकि अन्य क्षेत्रीय दल खाता भी नहीं खोल पाए। क्षेत्रीय दलों की चुनावों में स्थिति लगातार गिर रही है। वर्ष 2011 में बना उत्तराखंड रक्षा मोर्चा भी आपसी मतभेदों में बिखर गया है।
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हालांकि दल के शीर्ष नेता पूर्व सांसद टीपीएस रावत ने दल को आप में विलय कर अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने की कोशिश जरूर की है। उक्रांद के दो गुटों में बंटने से क्षेत्रीय दलों की राजनीति सर्वाधिक प्रभावित हुई है।
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पार्टी का जीता एकमात्र विधायक कांग्रेस की गठबंधन सरकार में कैबिनेट मंत्री है, बावजूद पार्टी चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है।
ऐसी स्थिति में उक्रांद सहित अन्य छोटे क्षेत्र दल जैसे उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी आदि का चुनावों में कोई बड़ा असर छोड़ने की उम्मीद कम दिखती है। इक्का-दुक्का विधानसभा क्षेत्रों में यह दल कुछ वोट काट सकते हैं।
हाथी की चाल: कितनी मदमस्त
हाल ही में बसपा सुप्रीमो मायावती ने कांग्रेस के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की थी। उत्तराखंड में बसपा को पहाड़ पर चढ़ने में सफलता तो नहीं मिली अलबत्ता हरिद्वार में उसके असर से इंकार नहीं किया जा सकता।
बसपा 2012 के विधानसभा चुनाव में हरिद्वार से तीन सीट झटकने में कामयाब भी रही थी। हरिद्वार हालांकि कांग्रेस सांसद का निर्वाचन क्षेत्र था और कांग्रेस ने 2009 के लोक सभा चुनाव में इस क्षेत्र से खासे मार्जिन से जीत भी हासिल की थी।
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2004 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने केवल तीन सीटों पर प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। गढ़वाल, नैनीताल और हरिद्वार। 2009 में बसपा ने पांचों सीटों पर ताल ठोकी। 2004 के मुकाबले 2009 में बसपा का वोट बैंक बढ़ा ही था।
टिहरी में बसपा ने करीब 13 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। गढ़वाल में बसपा का वोट प्रतिशत चार प्रतिशत बढ़ा। नैनीताल में बसपा ने 2009 में करीब 19 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। 2009 के चुनाव में हरिद्वार में हालांकि बसपा का वोट प्रतिशत करीब एक प्रतिशत कम हो गया था।
‘अन्य’ के लिए कितनी बनेगी गुंजाइश
कांग्रेस-भाजपा से इतर दलों के लिए इस बार कितनी गुंजाइश होगी यह तो चुनाव के बाद ही साफ होगा। पर इतना तय है कि इस बार अन्य दलों के लिए समीकरण मुफीद है।
पिछले लोक सभा चुनावों का हाल देंखें तो प्रदेश में 92 प्रतिशत वोट कांग्रेस, भाजपा और बसपा की झोली में ही आते रहे हैं।
सपा छुपा रुस्तम
सपा को समीकरण से हटाना फिलहाल किसी भी राजनीतिक दल के लिए संभव नही हो पाएगा। 2004 के लोक सभा चुनाव में सपा ने पांचों सीटों पर कदमताल किया था।
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चार सीटों पर सपा को मात्र तीन प्रतिशत तक ही वोट मिल पाए थे। पर हरिद्वार में सपा ने अपनी मजबूत पकड़ साबित की थी। सपा को 2004 में हरिद्वार में करीब 33 प्रतिशत वोट मिले थे।
कांग्रेस उस समय मात्र 15 प्रतिशत और भाजपा 24 प्रतिशत वोट हासिल कर पाई थी। पर 2009 में सपा यह ग्राफ बना कर नहीं रख पाई।
2009 में सपा ने सिर्फ दो सीटों पर चुनाव लड़ा और उस समयsss हरिद्वार में सपा को मात्र साढ़े चार प्रतिशत वोटों को लेकर संतोष करना पड़ा था।