उत्तराखंड सियासी संकटः बागी विधायकों के भविष्य पर निर्भर
- सदस्यता बहाल हुई तो भाजपा और सदस्यता बहाल नहीं हुई तो रावत सरकार मारेगी बाजी
- सुनवाई लंबी खिंची तो मोदी सरकार को करना होगा संसद का सामना
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उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन हटाए जाने के नैनीताल हाईकोर्ट के फैसले पर 27 अप्रैल तक सुप्रीम कोर्ट की ओर से लगाई गई रोक ने भाजपा और कांग्रेस की बेचैनी बढ़ा दी है। उत्तराखंड में जारी सियासी संकट का ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है।
दोनों ही दलों का सारा दारोमदार 9 बागी विधायकों के भविष्य पर टिका है। अगर इन विधायकों की सदस्यता बहाल हुई तो सियासी बाजी भाजपा जीतेगी। इसके उलट फैसला आने पर रावत सरकार की वापसी तय हो जाएगी।
हालांकि भाजपा के सामने एक अन्य परेशानी भी है। अगर सुप्रीम कोर्ट ने नैनीताल हाईकोर्ट की तर्ज पर तत्काल फैसला करने के बदले सुनवाई के लिए लंबा वक्त लिया तो इससे मोदी सरकार और भाजपा की परेशानी बढ़ जाएगी। ऐसी स्थिति में मोदी सरकार को सोमवार से शुरू हो रहे संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण में राष्ट्रपति शासन पर मंजूरी हासिल करनी होगी। चूंकि राज्यसभा में सरकार के पास बहुमत नहीं है। ऐसे में राज्य में लगाए गए राष्ट्रपति शासन को मोदी सरकार को वापस लेना पड़ेगा।
भाजपा कांग्रेस दोनों की बढ़ी हुई हैं धड़कनें
भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल सांस रोक कर बागी विधायकों के संदर्भ में आने वाले फैसले का इंतजार कर रहे हैं। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट की राहत को अभी फौरी ही माना जाएगा क्योंकि राष्ट्रपति शासन 27 तक जारी रखने के अलावा इसमें पार्टी के लिए राहत की फिलहाल कोई बात नहीं है। मुख्य सवाल बागी सदस्यों की सदस्यता का है, जिस पर अभी फैसला आना है।
अपने अपने दावे
बागी विधायकों पर भाजपा और कांग्रेस अपने अपने पक्ष में दलील दे रहे हैं। भाजपा का कहना है कि विनियोग बिल पेश किए जाने के दौरान ही रावत सरकार गिर गई थी। ऐसे में विधानसभा अध्यक्ष विधायकों के भविष्य पर कैसे फैसला कर सकते हैं। कांग्रेस का कहना है कि यह स्पीकर का विशेषाधिकार है। सभी 9 बागी विधायक भाजपा के साथ सार्वजनिक तौर पर खड़े हुए। ऐसे में इनके खिलाफ दल विरोधी कानून का मामला बनता है।