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उत्तराखंड: इस साल शीत निद्रा भूल गए भालू, दो महीनों में पांच जिलों में हो चुकी हैं हमले की 21 घटनाएं
Wed, 29 Dec 2021 02:06 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal
अजय कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, उत्तरकाशी
अजय कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, उत्तरकाशी
Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal
Updated Wed, 29 Dec 2021 02:06 PM IST
सार
दरअसल, नवंबर माह से भालुओं की शीत निद्रा का समय शुरू हो जाता है। ऐसे में इस दौरान भालू के हमले की घटनाएं कम होती जाती हैं। लेकिन इस साल भालुओं के हमले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। इस समय उत्तरकाशी जनपद के 11 गांवों में भालुओं की दहशत है।
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- फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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विस्तार
जिस समय भालुओं को शीत निद्रा में होना चाहिए, उस समय भालू आबादी क्षेत्रों में मंडरा रहे हैं। यही वजह है कि उत्तरकाशी सहित गढ़वाल के पांच जनपदों में बीते दो महीने के भीतर इंसानों पर भालुओं के हमले की 21 घटनाएं सामने आ चुकी हैं। वन विभाग के अधिकारी भी भालुओं की शीत निद्रा के समय में आए बदलाव से हैरान हैं। उत्तरकाशी वन प्रभाग के अधिकारी इस बदलाव की वजह जानने के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) की मदद लेने पर विचार कर रहे हैं।
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11 गांवों में भालुओं की दहशत
दरअसल, नवंबर माह से भालुओं की शीत निद्रा का समय शुरू हो जाता है। ऐसे में इस दौरान भालू के हमले की घटनाएं कम होती जाती हैं। लेकिन इस साल भालुओं के हमले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। इस समय उत्तरकाशी जनपद के 11 गांवों में भालुओं की दहशत है।
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वन क्षेत्राधिकारी बाड़ाहाट रेंज रविंद्र पुंडीर का कहना है कि दिसंबर तक भालू शीत निद्रा पर चले जाते हैं। लेकिन अप्रत्याशित ढंग से इस साल दिसंबर में भी भालुओं के हमले की घटनाएं सामने आ रही हैं। हालांकि विभागीय अधिकारी बर्फबारी के बाद भालुओं के शीत निद्रा पर जाने के बाद हमले कम होने की संभावना जता रहे हैं।
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क्या होती है शीत निद्रा
जीवविज्ञान में हाइबरनेशन को हिंदी में शीत निद्रा कहते हैं। भालू, कछुए, मेंढक और सांप जैसे बहुत से जीव सर्दियों में ऐसी जगह छिप जाते हैं, जहां ठंड का असर उन पर न हो। वे तीन से चार महीने तक लगातार सोए रहते हैं। इसी लंबी नींद की अवस्था को शीत निद्रा कहा जाता है। प्रतिकूल मौसम में भोजन नहीं मिल पाने के कारण शीत निद्रा जानवरों के लिए मददगार साबित होती है और उनके शरीर में पहले से जमा चर्बी और पोषक तत्वों से उनका जीवन बचा रहता है। हिमालयी राज्यों में काला भालू नवंबर से जनवरी तक शीत निद्रा पर रहता है। इसमें भी नर भालू सबसे पहले नवंबर से शीत निद्रा पर जाते हैं। मादा भालू दिसंबर तक शीत निद्रा पर जाती है।
भालू के हमले की घटनाएं
उत्तरकाशी- 5
टिहरी- 2
चमोली- 3
रुद्रप्रयाग- 4
पौड़ी- 7
साल में सर्वाधिक घटनाएं चमोली में
राज्य में भालुओं के हमले की सर्वाधिक घटनाएं इस साल चमोली जनपद में हुई हैं। इस साल करीब 70 घटनाओं में तीन लोगों की मौत हो चुकी है। यहां भालू 150 मवेशियों को भी मौत के घाट उतार चुके हैं। बीज बम अभियान के प्रणेता द्वारिका प्रसाद सेमवाल का कहना है कि जंगलों में खाना और पानी न मिलने के कारण ही वन्यजीव आबादी क्षेत्र के निकट आ रहे हैं। इससे वन्यजीव और मानव संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि अभियान के तहत जंगलों में ही वन्यजीवों को भोजन मिले, इसके लिए लौकी, कद्दू जैसे फल वाले बीज जंगलों में डाले जा रहे हैं। वन्यजीवों को जंगलों में ही पानी मिले, इसके लिए चाल-खाल निर्माण को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
भालुओं के हमले की घटनाएं ज्यादा होने के बाद मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक से भालुओं को पकड़ने की अनुमति मांगी गई है। पिंजरा भी मंगवाया गया है। रात्रि गश्त के साथ जागरूकता गोष्ठियों का आयोजन किया जा रहा है।
-पुनीत तोमर, डीएफओ, उत्तरकाशी वन प्रभाग