उत्तराखंड : जमीन और भवन को तरस रहे प्रदेश के थाने-चौकी, जमीन तो आवंटित, लेकिन बजट ही नहीं
दरअसल, राज्य बनने के बाद यहां पर कानून व्यवस्था बड़ी चुनौती थी। उत्तर प्रदेश के समय का संगठित अपराध की जड़ें उत्तराखंड में भी जमी हुई थीं।
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प्रदेश की कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल रही पुलिस भी मूलभूत जरूरतों के लिए तरस रही है। अलग राज्य बनने के बाद कई थाने-चौकी तो बढ़ाए गए, लेकिन इनमें कई को आज तक अपनी जमीन व भवन नहीं मिल सका है। कई थाने-चौकी ऐसे भी हैं, जिनके लिए जमीन तो आवंटित है, लेकिन भवन बनाने के लिए बजट ही नहीं है। प्रदेश में ऐसे थाने चौकियों की संख्या 130 है।
दरअसल, राज्य बनने के बाद यहां पर कानून व्यवस्था बड़ी चुनौती थी। उत्तर प्रदेश के समय का संगठित अपराध की जड़ें उत्तराखंड में भी जमी हुई थीं। ऐसे में उस वक्त यहां थाने-चौकियों की संख्या बढ़ाने की जरूरत थी। इसके बाद साल दर साल जरूरत के हिसाब से प्रदेश में थाने और चौकियां सृजित होती गईं।
इनकी वर्तमान में संख्या 160 हो गई है। जो कि राज्य गठन के समय से लगभग दोगुनी है। इनमें से कुछ थाने चौकी को जमीन बहुत पहले मिल चुकी है, लेकन भवन बनाने के लिए बजट की व्यवस्था ही नहीं है। कुछ थाने-चौकी ऐसे हैं जिनके लिए एक दशक बाद भी जमीन का चुनाव ही नहीं हो सका है।
थाने-चौकियों की स्थिति
थाने- 160
चौकियां- 237
भूमि है लेकिन भवन नहीं
थाने- 12
चौकी- 27
भूमि ही नहीं
थाने -10
चौकी-81
राज्य गठन के समय से ही भवन नहीं
कुछ थाने-चौकियां ऐसी भी हैं जिनके पास राज्य गठन के समय से ही अपना भवन नहीं है। वह अब तक किराए के भवनों ही संचालित की जा रही हैं। इनमें एक थाना और सात चौकियां शामिल हैं।
-थाना धरासु- उत्तरकाशी (चिन्यालीसौंड के भवन में चल रहा है।)
चौकियां
अल्मोड़ा- चौबटिया
नैनीताल- खैरना, बाजार कालाडूंगी
पिथौरागढ़-गवर्यांग
देहरादून- हाथीबड़कला (सर्वे ऑफ इंडिया के भवन में चल रही है), आईडीपीएल(आईडीपीएल के भवन में) और डाकपत्थर (सिंचाई विभाग के भवन में चल रही है।)
पुलिस मुख्यालय ने ऐसे थाना चौकियों का ब्योरा मांगा है। ताकि, इनके लिए भूमि और निर्माण के लिए बजट की व्यवस्था की जा सके। इसके तहत पुलिस मुख्यालय की ओर से शासन स्तर पर दोबारा से बातचीत की जाएगी।
-एडीजी अभिनव कुमार, प्रवक्ता उत्तराखंड पुलिस