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उत्तराखंड: विकास का फर्राटा भरें, लेकिन आपदा के लिए संवेदनशील प्रदेश में पर्यावरणीय चिंताओं का समाधान जरूरी

Thu, 11 Nov 2021 02:11 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal विनोद मुसान , अमर उजाला, देहरादून
विनोद मुसान , अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Thu, 11 Nov 2021 02:11 PM IST
सार

राज्य गठन के बाद केंद्र से सौगात के रूप में मिली करीब 890 किमी लंबी ऑल वेदर रोड परियोजना का काम अंतिम चरण में है। इस परियोजना को लेकर पर्यावरणीय दृष्टि से तमाम सवाल उठते रहे हैं, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि यह परियोजना पर्यटन से कहीं अधिक सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

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uttarakhand news: it is necessary to address  environmental concerns in disaster-sensitive state uttarakhand
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

विस्तार

राज्य बनने के बाद प्रदेश में सड़कों का जाल तेजी से बिछा है। राज्य गठन से पूर्व जहां सड़कों की कुल लंबाई 24412.20 किमी थी, वहीं वर्ष 2020 में इनकी कुल लंबाई 48471.56 किमी तक पहुंच गई। राज्य में प्रति लाख आबादी पर 428.58 किमी की सड़कें निर्मित हैं।

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पर्यावरणीय चिंताओं के बीच प्रदेश में सड़क का निर्माण भी महत्वपूर्ण
राज्य में निर्मित सड़कों की कुल लंबाई और प्रति हजार किमी क्षेत्रफल के अनुसार सड़कों की लंबाई में उत्तराखंड पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश से बेहतर स्थिति में है। राज्य गठन के बाद केंद्र से सौगात के रूप में मिली करीब 890 किमी लंबी ऑल वेदर रोड परियोजना का काम अंतिम चरण में है। इस परियोजना को लेकर पर्यावरणीय दृष्टि से तमाम सवाल उठते रहे हैं, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि यह परियोजना पर्यटन से कहीं अधिक सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
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जानकारों का मानना है कि पर्यावरणीय चिंताओं के बीच प्रदेश में सड़क का निर्माण भी महत्वपूर्ण है। लेकिन भविष्य की परियोजनाओं को हम और बेहतर तकनीक का इस्तेमाल कर बिना पर्यावरण को क्षति पहुंचाए और बेहतर बना सकते हैं। राज्य के सतत विकास के लिए जरूरी है कि हम प्राकृतिक संसाधनों के साथ बहुत ज्यादा छेड़छाड़ किए बिना इसमें आगे बढ़ें। 

कनेक्टिविटी के दूसरे साधनों पर भी हो विचार 
उदाहरण के तौर पर हम टिहरी बांध परियोजना की झील को ले सकते हैं। 42 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैली यह झील यातायात का बेहतर साधन हो सकती है। इस दिशा में सरकार की ओर से प्रयास शुरू भी किए गए हैं, लेकिन इस कनेक्टिविटी को और बढ़ाए जाने की जरूरत है। वर्तमान में टिहरी से घनसाली तक भिलंगना नदी में और टिहरी से धरासू तक भागीरथी नदी में बड़ी स्टीमर बोट चलाकर यात्रियों और सामान की बड़े पैमाने पर ढुलाई की जा सकती है। इसके अलावा छोटे-छोटे रोपवे और कार केबिल के जरिए वैकल्पिक कनेक्टिविटी को बढ़ाया जा सकता है। 

सीमांत इलाकों में महत्वपूर्ण हो सकती है रोपवे कनेक्टिविटी

सीमांत इलाकों में बजाय सड़कों और पुलों के निर्माण की जगह यदि रोपवे कनेक्टिविटी पर ध्यान दिया जाए तो ज्यादा कारगर हो सकता है। अकसर यहां अतिवृष्टि के बाद पुल, सड़कें बह जाती हैं। उत्तराखंड आपदाओं वाला प्रदेश है, इसलिए यहां सड़कों और दूसरी परियोजनाओं का निर्माण गहन अध्ययन के बाद ही किया जाना चाहिए। हमारे पहाड़ कच्चे हैं, इनकी तिरछी ढलानों से छेड़छाड़ जोखिमभरी हो सकती है। तोताघाटी और लामबगड़ इसके ताजे उदाहरण हैं।  
 -प्रो. रवि चोपड़ा (चारधाम मार्ग पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित हाई पावर कमेटी के अध्यक्ष)

सड़कों के निर्माण में अनियंत्रित और अवैज्ञानिक विस्फोटक घातक
पहाड़ी क्षेत्रों में जल्दबाजी के चक्कर में सड़कों के निर्माण में डायनामाइट विस्फोट अनियंत्रित और अवैज्ञानिक तरीके से किए जाते हैं। इससे भूस्खलन और दूसरी दिक्कतें बढ़ जाती हैं। दूसरा प्रश्न है, सड़क निर्माण के दौरान भूस्खलन को कैसे कम किया जाए। इसके लिए जरूरी है कि हम सड़क निर्माण के साथ ढलानों का भी वैज्ञानिक तरीके से साथ-साथ ट्रीटमेंट करते हुए आगे बढ़ें। उत्तराखंड में ऐसा नहीं हो रहा है। बेहतर तो यह होगा कि लैंडस्लाइड जोन को छेड़ा ही न जाए।
- डॉ. पीसी नवानी, पूर्व निदेशक, जियोलॉजीकल सर्वे ऑफ इंडिया और पूर्व निदेशक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रॉक माइनिंग 

सड़कों के निर्माण की तकनीक में और विकास की आवश्यकता
प्रदेश के विकास में सड़कों के महत्व को कमतर नहीं आंका जा सकता है।  हमें भविष्य में टिकाऊ विकास को ध्यान में रखते हुए योजनाएं बनानी होंगी। नवोन्मेषी अनुसंधान के बाद ही आगे बढ़ना होगा। लोनिवि के पास की इसकी बड़ी जिम्मेदारी है, लेकिन यहां भी इसकी कमी है। हालांकि अभी हाल ही में विभाग मुख्यालय स्तर पर एक नया डिजाइन एवं रिसर्च विंग बनाया गया है, लेकिन यह काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था। 
- शरद कुमार बिरला, रिटायर चीफ इंजीनियर, लोनिवि

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