उत्तराखंड: न ढालदार छतें और न ही सुरक्षात्मक उपाय, जानलेवा हो रहा पहाड़ में निर्माण, खास रिपोर्ट
पहाड़ की परंपरागत भवन निर्माण शैली की खास पहचान ढालदार छत, मिट्टी और पत्थर की दीवार और इसमें लकड़ी का उपयोग रही है। राज्य आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र के अधिकारियों का मानना है कि अब मकानों से ढालदार छत गायब होती जा रही है।
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गैरसैंण के भराड़ीसैंण में बना विधानसभा भवन हो या फिर आम लोगों के निर्माण कार्य। सभी कंक्रीट के निर्माण हैं, जो कहीं न कहीं पहाड़ के भौगोलिक स्वरूप के अनुकूल नहीं हैं और साथ ही जानलेवा भी बनते जा रहे हैं।
मकानों से गायब होती जा रही ढालदार छत
पहाड़ की परंपरागत भवन निर्माण शैली की खास पहचान ढालदार छत, मिट्टी और पत्थर की दीवार और इसमें लकड़ी का उपयोग रही है। राज्य आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र के अधिकारियों का मानना है कि उस शैली में कमरे छोटे होते थे और ये पहाड़ की परिस्थितियों को देखकर बनाए जाते थे। अब मकानों से ढालदार छत गायब होती जा रही है। इसकी जगह सीमेंट की मोटी परत वाली छत का प्रचलन बढ़ रहा है।
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इसके साथ ही सीमेंट और रोड़ी को मिलाकर बनाई जा रही ईंटों का उपयोग इन मकानों में किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मकान भूस्खलन के समय अधिक खतरनाक साबित हो रहे हैं। कारण यह भी है कि भारी छत होने के कारण ये मकान दीवार खिसकने से बैठ जाते हैं और इस कारण अंदर रहने वाले व्यक्ति के लिए बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।
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यह भी वजह
परंपरागत शैली के मकानों में लकड़ी, पत्थर और मिट्टी का खासा उपयोग होता है। स्थानीय स्तर पर खनन के प्रतिबंध के कारण छत के लिए पत्थर की स्लेट जुटाना अब मुश्किल है। इसी तरह जंगल की लकड़ी पर वन विभाग का एकाधिकार है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर संसाधन जुटाना मुश्किल हो रहा है। वन विभाग में आवेदन करने पर ही लकड़ी हासिल की जा सकती है।
900 साल पुरानी कोटी बनाल शैली भी खतरे में
प्रदेश के कई पर्वतीय जिलों में कोटी बनाल शैली बेहद प्रचलित रही है। इस शैली से लकड़ी के पांच मंजिला भवन तक तैयार किए जाते हैं। इस शैली से बने भवन कई भूकंपों को झेलने में भी सक्षम साबित हुए हैं। विशेषज्ञों के पास स्थान का चयन, मिट्टी और लकड़ी का चुनाव करने की व्यापक तकनीकी होती थी जो कि अब धीरे-धीरे गायब होती जा रही है। इस वजह से यह शैली भी खतरे में आने लगी है।
आज तक नहीं है विकास का कोई ठोस मॉडल
पहाड़ में वैसे तो हमेशा निर्माण कार्यों में परंपराओं से लेकर तमाम तरह की बातें होती आई हैं लेकिन पर्यावरण एवं जन सुरक्षा के तहत आज तक निर्माण का कोई ठोस मॉडल नहीं बन पाया है। इसके चलते बेलौस निर्माण ने पहाड़ को बदरंग बनाने के साथ ही जीवन और खतरनाक बना दिया है।
जांच और तकनीक होना चाहिए निर्माण का आधार
पहाड़ में जो भी निर्माण होता है, ज्यादातर ढलान पर होता है। जो भी ऐसा निर्माण हो, उसकी पहले भूगर्भीय जांच जरूरी है। तभी वह स्थायी होगा। पहाड़ों में अभी तक कंक्रीट के इस्तेमाल को लेकर भी कोई गंभीरता नहीं है। किस परिस्थति में किस गुणवत्ता के कंक्रीट का इस्तेमाल होना चाहिए, इस ओर सोचने की जरूरत है। खासतौर से उन इलाकों के निर्माण में, जहां बादल फटने जैसी घटनाएं होती आई हैं। इसी तरह पहाड़ में निर्माण के लिए सीसमिक जोन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। निजी या सरकारी जो भी निर्माण हो, उसे भूकंपरोधी बनाने पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। नदियों के किनारे निर्माण को रोकने की जरूरत है क्योंकि नदियों के किनारे हमेशा अस्थायी होते हैं, कभी भी ढह सकते हैं। कुल मिलाकर आज की तकनीकी के हिसाब से पहाड़ में निर्माण की ठोस नीति बनाने की जरूरत है।
-डॉ. एके बियानी, जियोलॉजी एक्सपर्ट