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बच्चों में ये लक्षण दिखें तो ध्यान दें: टाइप 1 डायबिटीज झेल रहे मासूम, नाजुक शरीर पर लगवा रहे इंसुलिन

Thu, 18 Jul 2024 11:19 AM IST
अलका त्यागी अमर उजाला, न्यूज डेस्क, देहरादून
अमर उजाला, न्यूज डेस्क, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Thu, 18 Jul 2024 11:19 AM IST
सार

टाइप 1 डायबिटीज में खाने वाली कोई दवा फायदेमंद नहीं होती है। इसमें इंसुलिन इंजेक्शन से ही इलाज संभव हो पाता है। बच्चों को एक या तीन से चार इंसुलिन इंजेक्शन लगाने पड़ते हैं।

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Uttarakhand News children suffering from Type 1 diabetes at  young age Took insulin
- फोटो : freepik

विस्तार

अगर आपका बच्चा बार-बार खाना खाता है और पानी पीता है। कई बार पेशाब भी जाता है। इसके बाद भी उसका वजन कम हो रहा है तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं। बच्चे को टाइप 1 डायबिटीज भी हो सकती है। हालांकि, अधिकतर मां-बाप इस बात को अनदेखा कर देते हैं। खुश होते हैं कि उनका बच्चा बार-बार खाना खा रहा है। दरअसल, 2 से 18 साल की उम्र के बच्चों में टाइप 1 डायबिटीज के मामले बढ़ रहे हैं। इस उम्र में बच्चे को टाइप 1 डायबिटीज हो जाती है तो इसका इलाज भी उम्र भर चलता है। नन्हीं सी उम्र में बच्चों के नाजुक शरीर पर इंसुलिन इंजेक्शन लगना शुरू हो जाता है। अस्पतालों में टाइप 1 डायबिटीज के पहले एक-दो ही मरीज आते थे, लेकिन अब छह से सात आ रहे हैं।

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डॉक्टरों के मुताबिक टाइप 1 डायबिटीज में खाने वाली कोई दवा फायदेमंद नहीं होती है। इसमें इंसुलिन इंजेक्शन से ही इलाज संभव हो पाता है। बच्चों को एक या तीन से चार इंसुलिन इंजेक्शन लगाने पड़ते हैं। डाइटिशियन की सलाह पर ही खानपान देना पड़ता है। दून मेडिकल कॉलेज, अस्पताल के बाल रोग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अशोक कुमार ने बताया कि टाइप 1 डायबिटीज लाइफ स्टाइल से संबंधित नहीं होती है। टाइप 1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून रोग है। इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से पैंक्रियास की इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाओं पर हमला कर देती है। उन्हें नष्ट कर देती है। इस कारण, शरीर में इंसुलिन की कमी हो जाती है, जो ब्लड शुगर (ग्लूकोज) के स्तर को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में शुगर भी कंट्रोल नहीं हो पाता है। इस वजह से टाइप 1 डायबिटीज हो जाती है। टाइप 1 डायबिटीज होने की संभावना 18 साल की उम्र तक होती है।
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जेनेटिक भी होती टाइप 1 डायबिटीज
दून मेडिकल कॉलेज, अस्पताल के बाल रोग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर मेजर डॉ. गौरव मुखीजा ने बताया कि टाइप 1 डायबिटीज जेनेटिक भी होती है। इसके अलावा यदि बच्चे को डायबिटीज है और डायबिटीज अब तक पकड़ में नहीं आई है। इसी बीच बच्चे को कोई इंफेक्शन हो गया तो वह डायबिटीज को भी बिगाड़ देता है।
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इंसुलिन से इलाज संभव
डॉ. गौरव ने बताया कि बच्चों को दो तरह के इंसुलिन दिए जाते हैं। एक इसमें एक लॉन्ग एक्टिंग इंसुलिन होता है जो 18 घंटे तक असर करता है। वहीं, दूसरा इंसुलिन 15 से 20 मिनट में असर दिखाने लगता है और इनका असर तीन से चार घंटे तक रहता है।

बच्चा ज्यादा खाना खाएं तो खुश न हों
डॉ. अशोक कुमार ने बताया कि शुरुआती दौर में टाइप 1 डायबिटीज की पहचान करना मुश्किल होता है। अगर बच्चा ज्यादा खाना खाता है तो घर वाले बहुत खुश होते हैं। जब वजन कम होता है तो इधर उधर उसका इलाज करवा करवाते हैं। टाइप 1 डायबिटीज को कई बार माता-पिता स्वीकार भी नहीं कर पाते हैं। ऐसे में माता पिता की काउंसिलिंग की जरूरत होती है।

वयस्कों में होती टाइप 2 डायबिटीज
डॉ. गौरव ने बताया कि वयस्कों में जो डायबिटीज होती है वह डायबिटीज टाइप 2 होती है। यह डायबिटीज भी जेनेटिक होती है। इसमें बेहतर डाइट, वजन कंट्रोल करने और फिजिकल एक्टिविटी करने से टाइप 2 डायबिटीज बिना दवा के भी कंट्रोल हो सकती है।

ये हैं लक्षण
- अधिक प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना
- अचानक वजन कम होना, भूख बढ़ना
- थकान कमजोरी, चिड़चिड़ापन

टाइप 1 डायबिटीज के प्रमुख कारण
- जेनेटिक - जिन बच्चों के माता-पिता या भाई-बहन को टाइप 1 डायबिटीज है, इनमें जोखिम अधिक होता है।
- ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया - शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपने ही पैंक्रियास की बीटा कोशिकाओं पर हमला कर देती है।
- पर्यावरणीय कारक - कुछ वायरस का संक्रमण इस बीमारी के विकास में भूमिका निभा सकता है।
- बच्चों में शुरुआती जीवन में होने वाले वायरल संक्रमण इस बीमारी का जोखिम बढ़ा सकते हैं।
- विटामिन डी की कमी

उपचार के मुख्य उपाय
- इंसुलिन इंजेक्शन या इंसुलिन पंप के माध्यम से शरीर में इंसुलिन की पूर्ति करना
- ब्लड शुगर की नियमित निगरानी
- ब्लड शुगर स्तर को दिन में कई बार मापना जरूरी
- ग्लूकोमीटर या निरंतर ग्लूकोज मॉनिटरिंग उपकरण का उपयोग करना
- कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा का संतुलित सेवन।
- नियमित शारीरिक गतिविधि ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में मदद करती है।
- नियमित रूप से डॉक्टर से परामर्श और जांच कराना।

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