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उत्तराखंड: हर मौसम में ठप हो रही ऑलवेदर रोड, दरकते पहाड़ और भूस्खलन के कारण जानमाल का खतरा

Mon, 02 Aug 2021 08:18 PM IST
अलका त्यागी विनोद मुसान, अमर उजाला, देहरादून
विनोद मुसान, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Mon, 02 Aug 2021 08:18 PM IST
सार

ऑलवेदर रोड के कई हिस्से बनने के साथ ही दरक रहे हैं तो कहीं चट्टानों का सही ढंग से कटान न किए जाने के कारण वह बारिशों में भूस्खलन के रूप में सड़क पर आ जा रहे हैं।

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Uttarakhand News: All weather road Blocked and Break in every season
बदरीनाथ हाईवे - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

विस्तार

केंद्र सरकार की धार्मिक पर्यटन और सामरिक रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण चारधाम प्रोजेक्ट ऑलवेदर रोड अपने उद्देश्यों को फिलहाल पूरा नहीं कर पा रही है। केंद्र की ओर से इसे किसी भी कीमत पर जल्द से जल्द पूरा किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन जल्दबाजी में किए जा रहे यही प्रयास, अब परियोजना ही नहीं लोगों के लिए भी मुसीबत का कारण बनते जा रहे हैं। ऑलवेदर रोड के बड़े हिस्से में डेंजर जोन चिह्नित किए गए हैं। कार्यदायी संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं।

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ऑलवेदर रोड के कई हिस्से बनने के साथ ही दरक रहे हैं तो कहीं चट्टानों का सही ढंग से कटान न किए जाने के कारण वह बारिशों में भूस्खलन के रूप में सड़क पर आ जा रहे हैं। बोल्डरों (बड़े-बड़े पत्थर) के गिरने का सिलसिला भी जारी है। ऐसे में इन सड़कों पर यात्रा करना खतरे से खाली नहीं है। प्रदेश में खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में हो रही बारिश के चलते नदियों के उफान पर आने और भूस्खलन के बीच ऑलवेदर रोड के कई हिस्से लगातार दरक रहे हैं।
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चारधाम ऑलवेदर रोड प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है। इसकी शुरूआत 2016 में हुई थी। जैसा कि नाम से जाहिर है कि यहां बनने वाली सड़कों को हर मौसम के हिसाब से बनाया जाएगा। इस परियोजना के तहत करीब 900 किमी लंबी सड़क को चौड़ा किया जा रहा है। यह सड़क केदारनाथ, बदरीनाथ, युमनोत्री और गंगोत्री के साथ ही टनकपुर-पिथौरागढ़ की कनेक्टिविटी वाल सड़क भी है।

सर्वे में सामने आए थे 60 डेंजर जोन
पिछले दिनों परिवहन विभाग और टिहरी जिला प्रशासन ने ऋषिकेश गंगोत्री और बदरीनाथ ऑल वेदर रोड पर करीब 150 किमी हिस्से में सर्वे किया था। जिसमें 60 डेंजर जोन सामने आए थे। सर्वे की रिपोर्ट में कहा गया था। कई जगह सड़कों फैला मलबा, पहाड़ी पर अटके पत्थर और कई जगह सड़कों का बेहद संकरा होना, आने वाले समय में जानमाल के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इधर, लोनिवि के अधिकारियों की मानें तो पूरे राज्य में भूस्खलन के करीब 84 डेंजर जोन चिह्नित किए गए हैं।

चोपड़ा कमेटी ने एक साल पहले ही उठाए थे सवाल
ऑलवेदर सड़क के निर्माण के समय से ही पर्यावरणविद इसमें नियमों की अनदेखी और निर्माण के तरीकों पर सवाल उठा रहे है। तमाम विरोधों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने रवि चोपड़ा कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी ने पिछले वर्ष चारधाम प्रोजेक्ट से पर्यावरण और पारिस्थितिकी को हो रहे नुकसान की रिपोर्ट पर्यावरण मंत्रालय को सौंपी थी। जिसमें पेड़ों के कटान से लेकर अव्यवस्थित तरीके चट्टानों के कटान, डंपिंग जोन और तमाम दूसरी अनियमितताओं पर सवाल उठाए गए थे। रिपोर्ट में इस बात की भी आशंका व्यक्त की गई थी कि भविष्य में ऑल वेदर रोड बड़े भूस्खलनों के कारण दुर्घटनाओं का कारण बन सकती है।

ऑलवेदर रोड निर्माण पर विशेषज्ञों की राय

बरसात के इस मौसम में विभाग के अधिकतर निर्माण कार्य और डामरीकरण का कार्य पूरी तरह से बंद है। हमारा पूरा फोकस सड़कों को खोलने पर है। हम प्रतिदिन 100 से 150 सड़कें खोल रहे हैं। राज्य में इस समय कुल 84 भूस्खलन वाले डेंजर जोन चिह्नित किए गए हैं। भूस्खलन वाले चिह्नित क्षेत्रों में दो से चार जेसीबी लगाई गई हैं। इस समय करीब 430 जेसीबी मशीनों को सड़कों को खोलने के काम में लगाया गया है। जहां तक ऑल वेदर रोड के रखरखाव का काम है, वह केंद्रीय कार्यदायी एजेंसियों के द्वारा ही किया जा रहा है।
-हरिओम शर्मा, प्रमुख अभियंता, लोनिवि

पूरे विश्व में हिमालय ही सिर्फ पहाड़ नहीं है। यूरोप और विश्व के तमाम देशों में पहाड़ों में सड़कें बनाई जाती हैं और विकास के लिए निर्माण कार्य किए जाते हैं। लेकिन वहां निर्माण अवधि से अधिक समय शोध को दिया जाता है। पर्यावरण के साथ पारिस्थितिकी का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। जबकि हमारे यहां निर्माण पर अधिक ध्यान दिया जाता है। यहीं से समस्या का जन्म होता है। ऑलवेदर रोड के निर्माण में भी यही हुआ है। भविष्य की समस्याओं पर ध्यान न देकर निर्माण की गति पर ध्यान ज्यादा दिया जा रहा है। जिससे भूस्खलन और तमाम दूसरी समस्याएं पैदा हो रही हैं।
- पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, पर्यावरणविद एवं हेस्को प्रमुख

जब भी किसी ढलान का कटान होता है तो कटान के आसपास के क्षेत्र में अस्थिरता पैदा हो जाती है। प्राकृतिक कारणों में चट्टानों के संधि भ्रंश उजागर होते हैं। समय-समय पर आने वाले भूकंपों के कारण चट्टानें हिल जाती हैं। भीतर से कमजोर पड़ जाती हैं। साथ ही इन चट्टानों के बीच जल के दबाव में अंतर आ जाता है। जब चट्टानों को विस्फोटों से तोड़ा जाता है तो इनकी संधियां और ब्रांच रन भ्रंश (फाल्ट) जैसी दरारें खुल जाती हैं। इनमें वर्षा जल प्रवेश कर जाता है। इसके बाद चट्टानों की प्रकृति स्थाई नहीं रह पाती और इनमें घर्षण  शुरू हो जाता है। पानी के कारण उनका वजन भी बढ़ जाता है, जिससे चट्टानों का ढलान की ओर खिसकना शुरू हो जाता है। ऑल वेदर रोड के मामले में भी बहुत से स्थानों पर ऐसा ही देखने को मिल रहा है।
- डॉ. एके बियानी, भूगर्भशास्त्री, डीबीएस पीजी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य

हिमालय सबसे नया पर्वत होने के साथ ही सबसे कमजोर भी है। इस इलाके में निर्माण को लेकर काफी संवेदनशीलता बरतनी चाहिए। यहां भूस्खलन के ज्यादातर हादसे सड़कों के साथ ही होते हैं। सड़क का वर्टिकल कर्व भी लैंडस्लाइड को न्योता देता है। इसलिए सड़कों के निर्माण के समय चट्टानों का कटान एक निश्चत ढलान के साथ होना चाहिए। ऐसे में भूस्खलन का खतरा कम रहता है। 
- डॉ. केपी जुयाल, भूगर्भशास्त्री, वाडिया भू-विज्ञान संस्थान से सेवानिवृत्त

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