उत्तराखंड में पैराशूट से सीएम न उतरा तो ये होंगे प्रबल दावेदार
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भाजपा को उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत मिलने के बाद अब मुख्यमंत्री पद पर फैसला लिया जाना है। सीएम की जगह पीएम मोदी का चेहरा आगे रखकर बंपर जीत हासिल करने के बाद केंद्रीय नेतृत्व के सामने कई विकल्प हैं।
यदि पैराशूट से केंद्र ने कोई नेता नहीं भेजा तो विधायकों में से दो बड़े नाम डोईवाला से जीते त्रिवेंद्र सिंह रावत और चौबट्टाखाल से जीते सतपाल महाराज सीएम के प्रबल दावेदार होंगे। अब तक रेस में माने जा रहे प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट को सबसे बड़ा झटका लगा, जो रानीखेत सीट गंवाने के साथ ही दौड़ से बाहर हो गए।
त्रिवेंद्र की बड़ी जीत के साथ राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और संघ की मजबूत पृष्ठभूमि उनके पक्ष में बताई जा रही है। उधर, कांग्रेस से आए महाराज की संघ की पृष्ठभूमि नहीं है, लेकिन दो वर्षों में उन्होंने संगठन और संघ में खासी पैठ बनाई है।
केंद्र में सुशासन का मोदी मॉडल राज्य में संचालित होने वाली सरकार
भाजपा में सीएम पद की दावेदारी की परंपरा नहीं है, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व में जिस विधायक की गणित मजबूत होगी, उसे ही पार्टी कुर्सी पर बैठाएगी। हालांकि सीएम की कुर्सी के लिए पार्टी बेदाग छवि को आगे रखना चाहेगी, ताकि 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए प्लेटफार्म तैयार हो सके।
केंद्रीय नेतृत्व चाहता है कि केंद्र में सुशासन का मोदी मॉडल राज्य में संचालित होने वाली सरकार में दिखे। औपचारिक तौर पर पार्टी नेतृत्व का कहना है कि यह फैसला विधायकों पर छोड़ा गया है, लेकिन हकीकत में अंतिम निर्णय केंद्रीय नेतृत्व ही लेगा। प्रचार की रणनीति में पार्टी ने चुनाव लड़ रहे दो चेहरों सतपाल महाराज और अजय भट्ट को पोस्टर, बैनर में जगह दी।
अजय भट्ट प्रदेश अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष और चुनाव समिति के अध्यक्ष होने के नाते प्रबल दावेदार थे, लेकिन वे मोदी लहर में भी चुनाव हार गए। महाराज की बेदाग छवि के साथ राष्ट्रीय नेता के तौर पर पहचान उनको फायदा दे सकती है। केंद्रीय राजनीति छोड़कर महाराज को जिस तरह पार्टी ने विधानसभा चुनाव में उतारा, उससे साफ हो रहा है कि उनको अहम जिम्मेदारी मिल सकती है। इस चुनाव में वे भाजपा के सरप्राइज पैकेज की तरह रहे।
महाराज ने इस दौरान संघ के साथ अपने रिश्ते मजबूत किए
पार्टी ने दो साल तक महाराज को वेटिंग में रखा। लेकिन प्रचार अभियान शुरू करने के साथ ही उन्हें पोस्टर ब्वाय बनाकर पार्टी ने उतारा, तो कई पुराने नेता भी हैरान रह गए। बताया जा रहा है कि महाराज ने इस दौरान संघ के साथ अपने रिश्ते मजबूत किए हैं।
चुनाव के दौरान भी अपना प्रचार अभियान छोड़ महाराज संघ प्रमुख मोहन भागवत के निमंत्रण पर नागपुर गए थे। मतदान के बाद से महाराज लगातार अपने पक्ष में जिताऊ प्रत्याशियों के संपर्क में रहे हैं और उन्होंने अपनी लॉबिंग में संघ के कई चेहरों को जोड़ा है। कई पार्टी पदाधिकारी भी महाराज के पीछे हो लिये हैं, जो सार्वजनिक समारोह में उनके साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं।
सीएम की रेस में त्रिवेंद्र सिंह रावत भी प्रबल दावेदार हैं। त्रिवेंद्र भले लगातार दो विधानसभा चुनाव हारे हों, लेकिन पार्टी में उनका ओहदा लगातार बढ़ा है। झारखंड विधानसभा चुनाव से पहले रावत को वहां का प्रभारी बनाया गया और भाजपा की सरकार बनी। पार्टी की उत्तराखंड में दिग्गज नेताओं की कोर कमेटी में उनको स्थान दिया गया। त्रिवेंद्र संघ के खांटी नेताओं में शुमार हैं, जो दूसरी पांत के नेताओं में सबसे वरिष्ठ माने जाते हैं।
त्रिवेंद्र अपने समर्थन में संघ की पृष्ठभूमि वाले जिताऊ प्रत्याशियों के साथ केंद्रीय पदाधिकारियों को जोड़ रहे हैं। दिल्ली की सीनियर लीडरशिप से उनकी मुलाकात के बाद शुक्रवार को उनके समर्थकों के चेहरे खिले हुए दिखे। इस बार उनकी लगभग 24 हजार के अंतर से जीत रही है। त्रिवेंद्र को अगर पार्टी सीएम बनाती है तो सतपाल महाराज का उपयोग किस तरह किया जाएगा, इस पर भी नेताओं को मंथन करना होगा। महाराज कैबिनेट मंत्री तो बनेंगे नहीं, ऐसे में उनको स्पीकर का पद दिया जा सकता है। त्रिवेंद्र और महाराज के अलावा प्रकाश पंत भी दूसरी पांत के वरिष्ठ नेताओं में शुमार हैं।
पैराशूट सीएम की संभावना कम
बंपर जनमत ने पैराशूट प्रत्याशी की संभावना को कम कर दिया है। अगर खंडित जनादेश मिलता तो सीएम के दावेदारों का गणित बिगड़ सकता था। अब विधायकों की जगह बाहर से भी पैराशूट सीएम आने की संभावनाएं कम दिख रही हैं। पूर्व मुख्यमंत्रियों में रमेश पोखरियाल निशंक और केंद्रीय राज्य मंत्री अजय टम्टा का नाम भी सीएम के तौर पर उछलता रहा है, जबकि पूर्व सीएम बीसी खंडूड़ी और भगत सिंह कोश्यारी की अधिक उम्र होने के चलते उनकी संभावनाएं लगभग समाप्त मानी जा रही हैं।
पूर्व सीएम विजय बहुगुणा की 12 विधायकों की टीम से केवल दो शैलेंद्र मोहन सिंघल और शैलारानी रावत हारे हैं, जबकि अन्य सभी बड़े अंतर से जीते हैं। बहुगुणा की इस चुनाव में बेहद अहम भूमिका रही है। कांग्रेस को सर्वाधिक नुकसान भी उनकी घुसपैठ से हुआ है। फिर कई बड़े चेहरे उन्होंने भाजपा में शामिल करवाए हैं, लेकिन भाजपा की बागियों के बिना भी भारी जीत उनको सीएम की रेस से बाहर बनाती दिख रही है।
ऐसे चुना जाएगा बीजेपी का सीएम
भाजपा में सीएम का चुनाव किये जाने के लिए तय प्रक्रिया है। रविवार को पार्टी के केंद्रीय संसदीय बोर्ड की बैठक बुलाई गई है, जिसमें विधायक मंडल की बैठक के लिए केंद्रीय पर्यवेक्षक नियुक्ति किए जाएंगे। यह पर्यवेक्षक होली या उससे अगले दिन विधायकों के साथ बैठक करेंगे। इस बैठक में किसी एक विधायक या अन्य नेता के नाम का प्रस्ताव रखा जाएगा, जिस पर विधायकों की सहमति या असहमति के आधार पर केंद्रीय संसदीय बोर्ड को पर्यवेक्षक अवगत करवाएंगे। प्रस्ताव पारित होने के बाद केंद्रीय संसदीय बोर्ड उस नाम की घोषणा करेगा। संभावना है कि होली के तुरंत बाद नाम की घोषणा हो जाएगी।